शिक्षा केवल स्कूल या डिग्री तक सीमित नहीं है। वह सीखने की वह प्रक्रिया है जिसमें जानकारी समझ बनती है, और समझ चरित्र बनती है। आज सूचना हर जगह उपलब्ध है, पर क्या सीखना है, किससे सीखना है और उसे जीवन में कैसे उतारना है, यह विवेक कम दिखता है। इसलिए शिक्षा का उद्देश्य केवल रोज़गार नहीं, जीवन की सही दृष्टि भी है।
गीता 4.34 योग्य गुरु से विनम्रता, सेवा और जिज्ञासापूर्ण प्रश्नों द्वारा ज्ञान पाने की विधि बताती है, और गीता 4.38 ज्ञान को सबसे बड़ा शुद्धिकारक कहती है। गीता 4.4 में अर्जुन का तर्कसंगत प्रश्न बताता है कि जिज्ञासा ज्ञान की ओर पहला कदम है। गीता 4.33 कहती है कि बाहरी साधनों से किए यज्ञों की अपेक्षा ज्ञानयज्ञ श्रेष्ठ है, क्योंकि ज्ञान कर्मों को उनके परम उद्देश्य तक पहुँचाता है।
गीता 4.1 और 4.2 बताती हैं कि ज्ञान परंपरा से योग्य शिष्यों तक पहुँचता है, और परंपरा तथा शिक्षकों की श्रृंखला टूटने पर शुद्ध ज्ञान विकृत या लुप्त हो जाता है। गीता 6.43 और 6.44 पूर्व अभ्यास के संस्कारों के कारण साधक के सहज ही फिर ज्ञान-मार्ग की ओर आकर्षित होने की बात करती हैं। प्रश्न पूछने में संकोच न करें, विश्वसनीय स्रोतों का सम्मान करें और जो सीखें उसे आगे पहुँचाएँ।