सात्त्विक कर्ता: अनासक्त, अहंकाररहित, धैर्य-उत्साह से युक्त और सिद्धि-असिद्धि में सम
सात्त्विक कर्ता आसक्ति और 'मैं' के अहंकार से मुक्त होता है, धैर्य और उत्साह से कार्य करता है, तथा सिद्धि या असिद्धि में हर्ष-शोक से विचलित नहीं होता।
जीवन में उपयोग: उत्साह और धैर्य से कार्य करें, पर सफलता पर अहंकार और असफलता पर निराशा को मन में स्थान न दें।