भगवद्गीता 11.25 — कालाग्नि-सदृश मुखों को देखकर अर्जुन की दिशाभ्रान्ति और प्रार्थना
दंष्ट्राकरालानि च ते मुखानि दृष्ट्वैव कालानलसन्निभानि ।
दिशो न जाने न लभे च शर्म प्रसीद देवेश जगन्निवास ॥ ११.२५ ॥
🔊 इस श्लोक का अर्थ सुनें
Current voice: —
Ready
Text-to-speech is not supported by this browser.
आपके दाढ़ों से भयंकर और प्रलयकाल की अग्नि के समान मुखों को देखकर मुझे दिशाओं का ज्ञान नहीं रहा और न ही मुझे शान्ति मिल रही है। हे देवेश! हे जगन्निवास! आप प्रसन्न हों।
पदच्छेद
संस्कृत श्लोक को अध्ययन-सुविधा के लिए अलग-अलग शब्दों में विभाजित किया गया है।
शब्दार्थ
| पंक्ति 1 | |
|---|---|
| संस्कृत शब्द | अर्थ |
| दंष्ट्राकरालानि | दाढ़ों से भयंकर |
| च | और |
| ते | आपके |
| मुखानि | मुखों को |
| दृष्ट्वा | देखकर |
| एव | ही |
| कालानलसन्निभानि | प्रलयकाल की अग्नि के समान |
| पंक्ति 2 | |
|---|---|
| संस्कृत शब्द | अर्थ |
| दिशः | दिशाएँ |
| न जाने | नहीं जानता |
| न लभे | नहीं पाता |
| च | और |
| शर्म | सुख, शान्ति |
| प्रसीद | प्रसन्न होइए |
| देवेश | हे देवों के ईश्वर |
| जगन्निवास | हे जगत् के आश्रय |
| पंक्ति 1 | पंक्ति 2 | ||
|---|---|---|---|
| संस्कृत शब्द | अर्थ | संस्कृत शब्द | अर्थ |
| दंष्ट्राकरालानि | दाढ़ों से भयंकर | दिशः | दिशाएँ |
| च | और | न जाने | नहीं जानता |
| ते | आपके | न लभे | नहीं पाता |
| मुखानि | मुखों को | च | और |
| दृष्ट्वा | देखकर | शर्म | सुख, शान्ति |
| एव | ही | प्रसीद | प्रसन्न होइए |
| कालानलसन्निभानि | प्रलयकाल की अग्नि के समान | देवेश | हे देवों के ईश्वर |
| जगन्निवास | हे जगत् के आश्रय | ||
विस्तृत विवरण
परिचय
इस श्लोक में अर्जुन भगवान के भयंकर मुखों को देखकर दिशाओं का बोध खो बैठते हैं और उनसे प्रसन्न होने की प्रार्थना करते हैं। यह भय से उठकर शरणागति की ओर जाने वाला श्लोक है।
भावार्थ
भय से शरणागति की ओर
अर्जुन कहते हैं कि आपके दाढ़ों के कारण विकराल और प्रलय की अग्नि के समान मुखों को देखकर मुझे दिशाओं का ज्ञान नहीं रहा और मुझे सुख नहीं मिल रहा। हे देवेश, हे जगन्निवास, आप प्रसन्न होइए।
कालानलसन्निभानि — प्रलयाग्नि के समान: काल की वह अग्नि जो सब कुछ भस्म कर देती है, उसकी उपमा यहाँ दी गई है। अर्जुन को भगवान का रूप अब समय की अनिवार्य शक्ति के रूप में दिख रहा है।
दिशो न जाने न लभे च शर्म — दिशाओं का ज्ञान नहीं, सुख नहीं: भय की चरम स्थिति में मनुष्य की दिशा-बुद्धि भी चली जाती है। अर्जुन जो रणक्षेत्र में सदा स्थिर रहे, वे यहाँ पूरी तरह भटके हुए हैं।
प्रसीद देवेश जगन्निवास — हे देवेश, हे जगत के आश्रय, प्रसन्न हों: यही इस श्लोक का मोड़ है। भय के क्षण में अर्जुन तर्क नहीं करते, केवल प्रार्थना करते हैं। 'जगन्निवास' संबोधन से वे याद करते हैं कि जिस रूप से डर रहे हैं, वही संसार का आश्रय भी है।
हमारे जीवन के लिए संदेश (भय के क्षण में प्रार्थना)
जब हम भय और भ्रम से घिर जाते हैं, तब सबसे सहज मार्ग है विनम्रतापूर्वक शरण में जाना। इसका अर्थ कर्म छोड़ना नहीं, बल्कि अपने अहंकार को पीछे रखकर सहायता और स्थिरता की प्रार्थना करना है। यह भाव मन को सहारा देता है।
भय से शरणागति की ओर
अर्जुन कहते हैं कि आपके दाढ़ों के कारण विकराल और प्रलय की अग्नि के समान मुखों को देखकर मुझे दिशाओं का ज्ञान नहीं रहा और मुझे सुख नहीं मिल रहा। हे देवेश, हे जगन्निवास, आप प्रसन्न होइए।
कालानलसन्निभानि — प्रलयाग्नि के समान: काल की वह अग्नि जो सब कुछ भस्म कर देती है, उसकी उपमा यहाँ दी गई है। अर्जुन को भगवान का रूप अब समय की अनिवार्य शक्ति के रूप में दिख रहा है।
दिशो न जाने न लभे च शर्म — दिशाओं का ज्ञान नहीं, सुख नहीं: भय की चरम स्थिति में मनुष्य की दिशा-बुद्धि भी चली जाती है। अर्जुन जो रणक्षेत्र में सदा स्थिर रहे, वे यहाँ पूरी तरह भटके हुए हैं।
प्रसीद देवेश जगन्निवास — हे देवेश, हे जगत के आश्रय, प्रसन्न हों: यही इस श्लोक का मोड़ है। भय के क्षण में अर्जुन तर्क नहीं करते, केवल प्रार्थना करते हैं। 'जगन्निवास' संबोधन से वे याद करते हैं कि जिस रूप से डर रहे हैं, वही संसार का आश्रय भी है।
हमारे जीवन के लिए संदेश (भय के क्षण में प्रार्थना)
जब हम भय और भ्रम से घिर जाते हैं, तब सबसे सहज मार्ग है विनम्रतापूर्वक शरण में जाना। इसका अर्थ कर्म छोड़ना नहीं, बल्कि अपने अहंकार को पीछे रखकर सहायता और स्थिरता की प्रार्थना करना है। यह भाव मन को सहारा देता है।
आगे का विषय
शरणागति की प्रार्थना के बाद अर्जुन उस दृश्य का वर्णन करते हैं जिसने उन्हें सबसे अधिक विचलित किया। अगले श्लोक में वे कौरव पक्ष के वीरों को उस रूप में प्रवेश करते देखते हैं।
इस श्लोक में छिपे संदेश
इस श्लोक को अलग-अलग दृष्टिकोणों से देखकर मनन करें और देखें कि कौन-सा गहरा संदेश आपके लिए खुलता है।
सूत्र
काल की अग्नि सबको समेटती है, फिर भी वह ईश्वर का ही रूप है।
जब अहंकार टूटता है तब दिशाएँ खो जाती हैं और शरण याद आती है।
भय में की गई प्रार्थना सबसे सच्ची होती है।
'प्रसन्न हों'—यह शब्द शरणागत हृदय की पुकार है।
जो जगत् का आश्रय है, वही भय में भी अन्तिम सहारा है।
बाहरी वैभव से नहीं, परम की कृपा से ही शान्ति मिलती है।
भय का अन्त सामर्थ्य दिखाने में नहीं, समर्पण में है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
'कालानलसन्निभानि' का क्या अर्थ है?
अर्जुन 'दिशो न जाने' क्यों कहते हैं?
'प्रसीद' का क्या भाव है?
'जगन्निवास' का क्या अर्थ है?
इस श्लोक का एक वाक्य में व्यावहारिक संदेश क्या है?
संबंधित विषय खोजें
इस श्लोक से जुड़े विषयों पर और श्लोक: