यज्ञ का अर्थ केवल अग्नि में आहुति देने की बाहरी विधि नहीं, बल्कि अपने कर्मों को योगदान, अर्पण और उच्च उद्देश्य की भावना से करना है। जब हम केवल अपने लाभ के लिए जीते हैं, तब जीवन सँकरा और बेचैन होता है, और जब कर्म सेवा तथा कृतज्ञता से जुड़ता है, तब वही साधारण काम पवित्र बन जाता है। गीता यज्ञ को ऐसे जीवन-सिद्धांत के रूप में रखती है जो दैनिक कर्म में भी उतारा जा सकता है।
गीता 3.9 कहती है कि कर्म स्वयं नहीं, उसके पीछे का स्वार्थ और आसक्ति बंधन बनती है, और यज्ञ-भाव से किया गया अनासक्त कर्म मुक्तिदायक है। गीता 4.31 के अनुसार यज्ञभाव से जीने वाला अंतःकरण की शुद्धि पाकर परम लक्ष्य की ओर बढ़ता है, जबकि केवल स्वार्थपूर्ण जीवन वास्तविक सुख नहीं देता, और गीता 18.5 सेवा, दान और संयम जैसे शुभ कर्मों को निरंतर करने को कहती है।
गीता 4.25 और 4.28 बताती हैं कि साधकों की प्रवृत्ति और पात्रता भिन्न होने से वे दान, तपस्या, योगाभ्यास और स्वाध्याय-ज्ञान जैसे विभिन्न यज्ञों से उन्नति करते हैं, इसलिए दूसरों से तुलना के बजाय अपने लिए उपयुक्त साधना चुनें। गीता 4.32 के अनुसार यज्ञ के वास्तविक तत्त्व को समझने से कर्मबंधन से मुक्ति मिलती है, और गीता 18.70 में गीता जैसे पवित्र संवाद का श्रद्धापूर्वक अध्ययन स्वयं ज्ञानयज्ञ है। गीता 9.20 चेताती है कि केवल भोग या स्वर्ग-जैसे फल की कामना से किया गया पुण्य कर्म परम लक्ष्य तक नहीं पहुँचाता।