गुरु वह मार्गदर्शक है जो केवल जानकारी नहीं देता, बल्कि हमारी समझ, दृष्टि और आचरण को सही दिशा देता है। जीवन के गहरे प्रश्नों में, जहाँ अनुमान और भ्रम हमें भटका सकते हैं, वहाँ अनुभवी मार्गदर्शक का सहारा बहुत काम आता है। गीता स्वयं गुरु और शिष्य के संवाद के रूप में प्रस्तुत है, इसलिए गुरु का स्थान इसके केंद्र में है।
गीता 4.34 के अनुसार सच्चा आध्यात्मिक ज्ञान योग्य तत्त्वदर्शी गुरु से विनम्रता, सेवा और जिज्ञासापूर्ण प्रश्नों के माध्यम से प्राप्त होता है, इसलिए जीवन के किसी भी क्षेत्र में गहन ज्ञान पाने के लिए अहंकार छोड़कर योग्य मार्गदर्शकों से सीखने की भावना रखें। गीता 6.39 में अर्जुन अपना संशय विनम्रता से रखकर कहते हैं कि इसका समाधान आप ही कर सकते हैं।
गीता 18.67 कहती है कि ज्ञान उसी को देना चाहिए जिसमें अनुशासन, भक्ति, सुनने की इच्छा और श्रद्धा हो, इसलिए शिष्य को भी सीखते समय अनुशासन, विनम्रता और श्रद्धा रखनी चाहिए। गीता 18.75 में संजय व्यासजी की कृपा से गीता-ज्ञान सुनने का सौभाग्य बताते हैं, जो गुरु-कृपा की ओर संकेत करता है, और गीता 6.42 श्रेष्ठ संगति और संस्कारों के वातावरण का महत्व दिखाती है।