स्वधर्म का अर्थ है अपने स्वभाव, क्षमता और कर्तव्य के अनुरूप वह कर्म जो हमारे हिस्से में आया है। हम अक्सर दूसरों की सफलता देखकर उनके रास्ते की नकल करना चाहते हैं, पर तब अपनी असली क्षमता का उपयोग नहीं हो पाता और भय तथा भ्रम बढ़ते हैं। गीता कहती है कि अपने मार्ग को पहचानना और उस पर निष्ठा से चलना ही स्थिरता और संतोष की कुंजी है।
गीता 3.35 के अनुसार अपने स्वभाव और कर्तव्य के अनुरूप कर्म साधक के लिए कल्याणकारी है, जबकि दूसरे के मार्ग की नकल भय और भ्रम उत्पन्न करती है, और गीता 18.47 में अपना धर्म, भले ही अपूर्ण दिखे, दूसरे के भली-भाँति निभाए धर्म से श्रेष्ठ है। गीता 18.41 बताती है कि कर्मों का विभाजन व्यक्ति के स्वभाव से उत्पन्न गुणों के आधार पर हुआ है, और गीता 18.43 में शौर्य, धैर्य, कुशलता और उदारता जैसे गुण स्वाभाविक कर्म के उदाहरण हैं।
गीता 2.31 कहती है कि स्वधर्म की स्पष्ट पहचान दुविधा को दूर करती है, और गीता 2.33 के अनुसार कर्तव्य से पलायन स्वधर्म, यश और नैतिक संतुलन की हानि है। गीता 18.59 बताती है कि अहंकार पर टिका निर्णय, जैसे 'मैं नहीं करूँगा', टिकता नहीं, क्योंकि स्वभाव कर्म की ओर प्रेरित करता है, इसलिए बड़ा निर्णय केवल भावावेश या अहंकार से न लें। गीता 18.45 के अनुसार निष्ठा से किया गया अपना कर्म सिद्धि का मार्ग है।