सफलता का अर्थ हर व्यक्ति के लिए अलग हो सकता है: पद, धन, सम्मान, परिवार की खुशी या मन की शांति। पर जब सफलता केवल बाहरी उपलब्धियों से मापी जाए, तो वह अस्थिर रहती है, क्योंकि लक्ष्य पाते ही नया लक्ष्य खड़ा हो जाता है। सच्ची सफलता में प्रयास, मूल्य और संतोष तीनों का संतुलन होता है, और उसे पाने के साथ उसे सँभालना भी सीखना पड़ता है।
गीता 18.78 का निष्कर्ष है कि जहाँ ईश्वरीय मार्गदर्शन और मनुष्य का पुरुषार्थ दोनों मिलते हैं, वहीं विजय, ऐश्वर्य और स्थिर नीति रहती है, इसलिए पूर्ण प्रयास और श्रद्धा दोनों रखें। गीता 7.22 के अनुसार सभी फलों के पीछे परम व्यवस्था भी काम करती है, इसलिए उपलब्धि पर केवल अपने प्रयास को नहीं, बल्कि बड़ी व्यवस्था को भी स्वीकारें और कृतज्ञ रहें।
गीता 7.10 और 10.36 बुद्धि, तेज, निश्चय और सामर्थ्य को ईश्वर की देन बताती हैं, इसलिए अहंकार से बचें और शक्ति का उपयोग सत्य तथा विवेक से करें। गीता 17.18 सम्मान और प्रतिष्ठा के लिए किए गए दिखावटी तप को राजसी और क्षणिक फल वाला कहती है, और गीता 1.45 में अर्जुन राज्य-सुख की कामना को स्वजन-वध के परिणाम से तौलते हैं, यानी जो लक्ष्य नैतिक मूल्यों की कीमत पर मिले, उस पर पुनर्विचार करें। गीता 9.21 बताती है कि कामनाओं पर टिका सुख क्षणिक है।