त्यागमय यज्ञ का अर्थ है ऐसा कर्म जिसमें हम कर्तव्य-भाव से देते हैं, बाँटते हैं और अर्पण करते हैं, बदले में फल, प्रशंसा या दिखावे की चाह के बिना। जब हम हर काम में पहले अपना लाभ गिनते हैं, तब जीवन सँकरा होता है, और जब कर्म में अर्पण और कृतज्ञता जुड़ती है, तब मन हल्का और संबंध गहरे होते हैं। गीता कर्म की प्रकृति को उसके भाव से परखती है।
गीता 17.11 के अनुसार जो यज्ञ शास्त्रविधि से, फल की कामना के बिना और केवल कर्तव्य मानकर मन को एकाग्र करके किया जाए, वही सात्त्विक है, और गीता 17.12 में फल और दिखावे के लिए किया गया यज्ञ राजसी हो जाता है। गीता 17.13 कहती है कि विधि, दान, मंत्र और श्रद्धा से रहित यज्ञ तामसी है, यानी वह खोखला कर्मकांड बन जाता है।
गीता 3.12 कहती है कि प्राप्त सुख-साधन ईश्वर और समाज की देन हैं, इसलिए अर्पण और कृतज्ञता के बिना केवल भोग करना अनुचित है, और गीता 3.13 के अनुसार बाँटकर ग्रहण करने वाला शुद्ध होता है जबकि केवल अपने लिए जीना बंधन बनता है। गीता 4.25 और 4.32 बताती हैं कि साधक अपनी पात्रता के अनुसार अलग-अलग यज्ञ अपनाते हैं और यज्ञ के वास्तविक तत्त्व को समझने से कर्मबंधन से मुक्ति मिलती है।