शिक्षा का उद्देश्य केवल परीक्षा पास करना नहीं, समझ, चरित्र और जीवन जीने की क्षमता विकसित करना है। अच्छी शिक्षा में तीन बातें साथ चलती हैं: सही मार्गदर्शक, सीखने वाले की जिज्ञासा और उचित वातावरण। इनमें से कोई एक कमज़ोर हो तो जानकारी मिलती है, पर समझ गहरी नहीं होती, और सीखा हुआ व्यवहार में नहीं उतरता।
गीता 4.34 योग्य गुरु से विनम्रता, सेवा और जिज्ञासापूर्ण प्रश्नों द्वारा ज्ञान पाने की विधि बताती है, और गीता 4.33 ज्ञानयज्ञ को बाहरी साधनों से श्रेष्ठ कहती है। गीता 5.16 कहती है कि ज्ञान अज्ञान को सूर्य की तरह मिटा देता है। गीता 4.4 में अर्जुन का प्रश्न सिखाता है कि जो बात समझ न आए, उसे विनम्रता से पूछकर स्पष्ट करना चाहिए।
गीता 5.4 बताती है कि ज्ञानयोग और कर्मयोग विरोधी नहीं हैं, इसलिए मार्गों और मतभेदों में उलझने के बजाय उनके साझा उद्देश्य को समझें। गीता 18.67 कहती है कि ज्ञान वहीं फलता है जहाँ अनुशासन, श्रद्धा, विनम्रता और सुनने की इच्छा हो, इसलिए साझा करते समय सामने वाले की ग्रहणशीलता देखें। गीता 6.42 श्रेष्ठ संगति और संस्कारों के वातावरण के महत्व को दिखाती है, और गीता 4.2 बताती है कि शिक्षकों की परंपरा टूटने पर ज्ञान धीरे-धीरे लुप्त हो जाता है।