कर्म का अर्थ केवल काम करना नहीं, बल्कि विचार, वाणी और व्यवहार से होने वाली हर क्रिया और उसके पीछे की भावना है। जीवन में कोई क्षणभर भी कर्म के बिना नहीं रहता, इसलिए असली प्रश्न यह है कि हम कर्म किस भाव, किस प्रेरणा और किस दृष्टि से करते हैं। गीता कर्म को समझने के लिए उसकी प्रेरणा, उसके कारण और उसके फल, तीनों पर ध्यान देने को कहती है।
गीता 18.18 कहती है कि कर्म की प्रेरणा ज्ञान, ज्ञेय और ज्ञाता से बनती है और कर्म की रचना करण, क्रिया और कर्ता से होती है, और गीता 18.14 के अनुसार कर्म की सिद्धि में अधिष्ठान, कर्ता, करण, विविध चेष्टाएँ और दैव, ये पाँच कारण काम करते हैं, जिनमें कर्ता केवल एक है। इसलिए अपना सर्वोत्तम प्रयास करें, पर परिणाम में परिस्थितियों और अदृश्य कारकों की भूमिका भी स्वीकारें।
गीता 14.16 बताती है कि सात्त्विक कर्म का फल निर्मल और शुभ है, राजस कर्म का फल दुःख है और तामस कर्म का फल अज्ञान है, इसलिए कर्म करने से पहले उसके प्रेरक भाव को परखें। गीता 18.11 के अनुसार वास्तविक त्याग कर्म छोड़ना नहीं, कर्मफल की आसक्ति छोड़ना है, और गीता 4.12 में तात्कालिक फल की चाह साधना को सीमित कर देती है। गीता 4.13 अपने स्वभाव और उत्तरदायित्वों को पहचानकर योगदान देने को कहती है, और गीता 4.17 में कर्म का विवेक जीवन को सही दिशा देता है।