राजर्षि वह आदर्श है जिसमें राजा जैसी ज़िम्मेदारी और ऋषि जैसी आंतरिक स्थिरता एक साथ मिलती है। ऐसा व्यक्ति ज्ञान पाने के बाद भी कर्म से भागता नहीं, बल्कि समाज को सही दिशा देने के लिए सक्रिय रहता है। यह आदर्श आज के नेताओं, माता-पिता, शिक्षकों और हर उत्तरदायी व्यक्ति के लिए प्रासंगिक है, जो अपने पद या भूमिका का उपयोग दूसरों के हित में करना चाहते हैं।
गीता 3.20 में जनक आदि के उदाहरण से बताया गया है कि ज्ञान प्राप्त करने के बाद भी आदर्श पुरुष लोकहित और समाज को सही दिशा देने के लिए कर्म करते रहते हैं, इसलिए अपने आचरण से समाज को प्रेरित करने का दायित्व समझकर कर्तव्य निभाएँ, चाहे व्यक्तिगत लाभ हो या न हो। गीता 3.21 के अनुसार श्रेष्ठ व्यक्ति जैसा आचरण करता है, लोग वैसा ही करते हैं, इसलिए नेतृत्व करने वाले को स्वयं उदाहरण बनना चाहिए।
गीता 9.33 कहती है कि जब सामान्य और दोषयुक्त माने गए लोग भी भगवान् की शरण से परम गति पाते हैं, तब पुण्यात्मा भक्तों और राजर्षियों की सिद्धि निश्चित है, और अनित्य तथा दुःखदायी संसार में आकर भगवान् का भजन ही उचित है। इसलिए संसार की अस्थिरता को समझकर सुख-सुविधाओं में ही उलझे न रहें, और समय रहते भक्ति, साधना और जीवन के परम उद्देश्य को प्राथमिकता दें।