क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ का भेद गीता का एक मूल विचार है: जो जाना जाता है, यानी शरीर, मन, इन्द्रियाँ और भावनाएँ, वह क्षेत्र है, और जो इन सबको जानता है, वह क्षेत्रज्ञ है। हम अक्सर अपनी पहचान शरीर और मन से जोड़ लेते हैं, इसलिए उनके उतार-चढ़ाव में हम भी डगमगाते हैं। यह भेद समझने से भीतर एक स्थिर साक्षी का अनुभव होता है और चिंता तथा मोह घटते हैं।
गीता 13.2 के अनुसार शरीर जानी जाने वाली वस्तु है, इसलिए उसे क्षेत्र कहा गया है, और उसे जानने वाला साक्षी चेतन तत्त्व क्षेत्रज्ञ है, जबकि गीता 13.3 में सब शरीरों में क्षेत्रज्ञ भगवान् अपना ही स्वरूप बताते हैं और इस भेद का तत्त्वतः ज्ञान ही वास्तविक ज्ञान है। गीता 13.7 इच्छा, द्वेष, सुख-दुःख और धृति जैसे मन के भावों को भी क्षेत्र के विकार गिनती है, जिन्हें जानने वाला साक्षी उनसे अलग है।
गीता 13.34 में जैसे एक सूर्य सारे जगत को प्रकाशित करता है, वैसे क्षेत्रज्ञ आत्मा शरीर, मन और इन्द्रियों को चेतना से प्रकाशित करता है, इसलिए अपनी चेतना को उनका प्रकाशक मानकर साक्षी के रूप में स्थिर रहने का अभ्यास करें। गीता 13.21 में शरीर-इन्द्रियों की रचना में प्रकृति कारण है और सुख-दुःख के भोग में जीवात्मा, तथा गीता 13.27 में सब प्राणी जड़ क्षेत्र और चेतन क्षेत्रज्ञ के संयोग से उत्पन्न होते हैं। गीता 13.1 और 13.4 में अर्जुन की जिज्ञासा और ध्यान से सुनना ज्ञान की शुरुआत है।