मन का नियंत्रण यह नहीं कि विचार आएँ ही नहीं, बल्कि यह कि हम हर विचार के पीछे न चलें। भटकता मन अध्ययन, काम और रिश्तों में हमारी ऊर्जा खींच लेता है, और बेकाबू मन छोटे आवेगों को बड़े पछतावों में बदल देता है। गीता मन को शत्रु नहीं, प्रशिक्षित किए जा सकने वाला सहयोगी मानती है, और इसके लिए धैर्य, अभ्यास और सजगता का रास्ता बताती है।
गीता 6.34 में अर्जुन मन को चंचल और हठी कहते हैं, और गीता 6.35 उत्तर देती है कि निरंतर अभ्यास और वैराग्य से उसे वश में किया जा सकता है, केवल इच्छा से नहीं। गीता 6.5 और 6.6 के अनुसार मन उत्थान का सबसे बड़ा सहारा भी है और पतन का कारण भी, इसलिए परिस्थितियों को दोष देने के बजाय अपने विचारों, आदतों और मन के प्रशिक्षण पर ध्यान दें। गीता 6.26 कहती है कि जहाँ मन भटके, उसे हर बार शांति से लौटाएँ।
गीता 2.62 बताती है कि विषय-चिंतन से आसक्ति, कामना और क्रोध बनते हैं, और गीता 2.63 कहती है कि क्रोध विवेक को ढककर पतन तक ले जाता है, इसलिए आवेग के क्षण में प्रतिक्रिया से पहले रुकें। गीता 5.23 में काम-क्रोध के आवेग को सहने वाला स्थायी सुख का अधिकारी बनता है। ध्यान, अध्ययन या काम में मन भटके तो स्वयं को कोसने के बजाय धैर्य से उसे वापस लाएँ।