श्रद्धा केवल बिना सोचे मान लेना नहीं, बल्कि वह भीतरी विश्वास है जो हमें मार्ग पर टिकाए रखता है, चाहे परिणाम तुरंत न दिखें। कठिन समय में संदेह आता है, तुलना भी आती है, पर जिसकी श्रद्धा जीवित रहती है, वह साधना और प्रयास जारी रख पाता है। गीता श्रद्धा को स्वभाव और संस्कारों से जोड़ती है, इसलिए उसे पहचानना और शुद्ध करना भी साधना का हिस्सा है।
गीता 17.2 और 17.3 बताती हैं कि हर मनुष्य श्रद्धामय है और उसकी श्रद्धा उसके स्वभाव के अनुसार सात्त्विकी, राजसी या तामसी होती है, जो उसके व्यक्तित्व तथा जीवन-दिशा को आकार देती है। गीता 9.25 कहती है कि जिसकी उपासना और जिस लक्ष्य के प्रति निष्ठा रखते हैं, वही मिलता है, इसलिए अपनी उपासना, संगति और प्राथमिकताओं पर ध्यान दें।
गीता 4.39 में श्रद्धा, तत्परता और इन्द्रियसंयम ज्ञान और परम शांति तक पहुँचाते हैं, और गीता 17.28 में श्रद्धा से रहित हर कर्म 'असत्' है, जबकि गीता 9.3 श्रद्धा के बिना साधना को अधूरा बताती है। गीता 3.31 श्रद्धा और दोष-दृष्टि के बिना उपदेश का पालन करने को मुक्तिदायक कहती है, और गीता 13.26 में जो अभी स्वयं नहीं जानते, वे भी श्रद्धा से सुनकर आगे बढ़ सकते हैं। गीता 12.20 श्रद्धा से अपनाए गए भक्ति-धर्म को भगवान् को प्रिय बताती है।