भक्ति का अर्थ केवल पूजा-पाठ की विधि नहीं, बल्कि ईश्वर के प्रति प्रेम, विश्वास और समर्पण का जीवंत भाव है। कोई संकट में ईश्वर की ओर मुड़ता है, कोई जिज्ञासा से, कोई आवश्यकता से, और कोई सहज प्रेम से। गीता इन सब आरंभों को स्वीकार करती है और भक्ति को निष्काम, ज्ञानयुक्त और निरंतर बनाने की दिशा दिखाती है।
गीता 9.26 कहती है कि भगवान् वस्तु की मात्रा या मूल्य नहीं, अर्पण करने वाले की भक्ति और शुद्ध भाव को देखते हैं, और गीता 8.14 के अनुसार जो मन को अन्यत्र न लगाकर नित्य निरंतर स्मरण करता है, उसके लिए भगवान् सुलभ हो जाते हैं। गीता 8.22 में सब प्राणियों के आधार परम पुरुष को अनन्य भक्ति से ही पाया जा सकता है, और गीता 4.3 में दिव्य ज्ञान उन्हें मिलता है जिनमें श्रद्धा, भक्ति और सच्चा संबंध है।
गीता 7.16 में दुःखी, जिज्ञासु, धन चाहने वाले और ज्ञानी, चार प्रकार के पुण्यशील लोग अपनी स्थिति से प्रेरित होकर भगवान् का भजन करते हैं, इसलिए किसी भी कारण से की गई भक्ति शुभ है, पर उसे निष्काम और ज्ञानयुक्त बनाना ही उसका उत्कर्ष है। गीता 13.19 में तत्त्व-ज्ञान जब भक्ति से जुड़ता है तब भगवान् की प्राप्ति का मार्ग बनता है, और गीता 11.36 में ईश्वर की महिमा का कीर्तन भक्त के हृदय में आनंद और शुद्धता बढ़ाता है। गीता 9.14 नियमित कीर्तन और दृढ़ संकल्प पर बल देती है।