संन्यास शब्द सुनते ही घर-परिवार छोड़कर वन चले जाने की छवि बनती है, पर गीता इस धारणा को गहराई देती है। सच्चा संन्यास कर्मों से भागना नहीं, बल्कि कामना, द्वेष और स्वार्थपूर्ण संकल्पों से मुक्त होना है। इसीलिए जो व्यक्ति परिवार, नौकरी और समाज की ज़िम्मेदारियों के बीच रहकर भी भीतर से स्वतंत्र है, वह भी गीता की दृष्टि में संन्यास के निकट है।
गीता 6.2 कहती है कि जिसे संन्यास कहा जाता है वही कर्मयोग है, क्योंकि संकल्पों और कामनाओं का त्याग किए बिना योग संभव नहीं, और गीता 5.3 के अनुसार सच्चा संन्यासी वह है जो द्वेष और कामना से मुक्त है। गीता 5.2 में संन्यास और कर्मयोग दोनों मोक्षदायक हैं, पर निष्काम भाव से कर्म करते हुए ईश्वर से जुड़े रहना अधिकांश साधकों के लिए श्रेष्ठ मार्ग है, और गीता 5.6 में योगयुक्त कर्म के बिना संन्यास कठिन बताया गया है।
गीता 18.2 के अनुसार कामना से प्रेरित कर्मों को छोड़ना संन्यास कहलाता है और कर्मफल की आसक्ति छोड़ना त्याग, यानी दोनों का केंद्र कामना और फलासक्ति से मुक्ति है। गीता 18.49 में जिसकी बुद्धि कहीं आसक्त नहीं, जिसने मन जीत लिया और जो स्पृहा से रहित है, वह संन्यास से नैष्कर्म्य-सिद्धि पाता है। गीता 5.1 और 18.1 में अर्जुन के प्रश्न सिखाते हैं कि उलझन हो तो विनम्रता से स्पष्ट प्रश्न पूछकर वास्तविक अर्थ समझें।