ईमानदारी एक ऐसा गुण है जो सोच, वाणी और व्यवहार की एकरूपता से बनता है: जो भीतर है, वही बाहर; जो कहा है, वही करना। दिखावे का अनुशासन, चतुराई से बचना और अपनी अनिश्चितता को स्वीकार करना, सब इसी के रूप हैं। गीता ईमानदारी को केवल बाहरी आचरण नहीं, मन की शुद्धि और साधनों की शुद्धता से जोड़कर देखती है।
गीता 3.6 कहती है कि इन्द्रियों को रोककर मन से विषयों का चिंतन करना मिथ्याचार है, यानी सच्चा संयम केवल बाहरी क्रिया का नियंत्रण नहीं, मन की शुद्धि है, इसलिए बाहरी दिखावे के अनुशासन से आगे बढ़कर अपने विचारों और इच्छाओं को भी ईमानदारी से परखें। गीता 2.6 में अनिश्चितता को ईमानदारी से स्वीकार करके सही दृष्टि के लिए मार्गदर्शन लेना स्पष्टता की ओर पहला कदम है।
गीता 16.12 के अनुसार धन कमाते समय साधनों की शुद्धता का ध्यान रखें और कोई भी आर्थिक लक्ष्य नैतिकता की कीमत पर न चुनें, और गीता 18.44 में अपने कार्य को ईमानदारी और गरिमा के साथ करने की सीख है। गीता 10.36 में सफलता, निश्चय और सामर्थ्य ईश्वर की देन हैं, इसलिए घमंड से बचें और शक्ति का प्रयोग सत्य तथा विवेक के साथ करें, और गीता 11.42 जहाँ भूल हो वहाँ विनम्रता से क्षमा माँगने को कहती है।