समय प्रबंधन का अर्थ घड़ी से लड़ना नहीं, बल्कि यह तय करना है कि सीमित समय किन कामों को दिया जाए। ज़रूरी काम टलते हैं, गैर-ज़रूरी काम बढ़ते हैं, और दिन भर की व्यस्तता के बाद भी खालीपन रहता है। जब हम समय को असीमित मान लेते हैं, तब टालमटोल आसान हो जाती है और जीवन के बड़े लक्ष्य पीछे छूटते जाते हैं।
गीता 11.27 में योद्धा तेज़ी से विकराल मुखों में प्रवेश करते दिखते हैं, जो काल की तीव्र और अटल गति तथा जीवन की क्षणभंगुरता का बोध कराता है, इसलिए समय व्यर्थ न गँवाकर कर्तव्य और आत्म-कल्याण को प्राथमिकता दें। गीता 10.30 में काल को ईश्वर की शक्ति का रूप बताया गया है, इसलिए समय का आदर करें। गीता 3.5 के अनुसार कोई क्षणभर बिना कर्म के नहीं रह सकता, इसलिए कर्म को सही दिशा देना ही उपाय है।
गीता 18.28 तामस कर्ता की पहचान टालमटोल, आलस्य और निराशा बताती है, और छोटे-छोटे नियमित कार्यों से इस प्रवृत्ति को तोड़ने की सीख देती है। गीता 18.39 और 14.8 आलस्य, प्रमाद और निद्रा से मिले सुख को मोह का रूप बताती हैं, और गीता 9.33 अनित्य संसार में समय रहते भक्ति और साधना को प्राथमिकता देने को कहती है। गीता 10.33 भाषा और समय को सावधानी और सम्मान से बरतने की याद दिलाती है।