मोक्ष का अर्थ केवल मृत्यु के बाद की कोई दूर की अवस्था नहीं, बल्कि बंधनों से मुक्ति है, जिसकी शुरुआत जीवन में ही हो सकती है। इच्छा, भय, क्रोध और अज्ञान जैसे बंधन हमें रोज़ बाँधते हैं, और जब हम इनसे थोड़ा भी मुक्त होते हैं तो भीतर हल्कापन महसूस होता है। गीता इस मुक्ति को जीवन से भागने में नहीं, जीवन को सही दृष्टि से जीने में देखती है।
गीता 5.28 कहती है कि जिसने इच्छा, भय और क्रोध पर विजय पा ली है तथा मोक्ष को अपना लक्ष्य बना लिया है, वह जीवन में ही मुक्त हो जाता है, और गीता 5.26 के अनुसार काम और क्रोध को जीतने वाले को परम शांति सुलभ होती है। गीता 5.24 में जिसका आनंद और प्रकाश भीतर से उत्पन्न होता है, वह ब्रह्मभाव और परम शांति पाता है, और गीता 6.22 आत्मानुभूति को ऐसा लाभ बताती है जिसके सामने बड़ा दुःख भी विचलित नहीं करता।
गीता 4.9 भगवान् के जन्म और कर्म की दिव्यता को तत्त्व से जानने वाले को कर्मबंधन और पुनर्जन्म से मुक्त बताती है, और गीता 6.45 में निरंतर प्रयास से अनेक जन्मों में परम गति मिलती है। गीता 2.72 ब्राह्मी स्थिति को मोह से मुक्ति देने वाली बताती है, और गीता 5.25 के अनुसार आत्मशुद्धि और लोककल्याण दोनों मिलकर परम शांति की ओर ले जाते हैं। इसलिए अपनी प्रमुख इच्छाओं, भय और क्रोध के स्रोतों को पहचानकर सजगता और आत्मसंयम से उन पर कार्य करें।