आंतरिक शांति का अर्थ यह नहीं कि जीवन में कोई समस्या न हो, बल्कि यह कि समस्याओं के बीच भी भीतर का केंद्र बना रहे। यह शांति न शोर कम होने से आती है, न केवल छुट्टियों से; वह तब बनती है जब हम अपनी इच्छाओं, अपेक्षाओं और प्रतिक्रियाओं को समझते हैं। इसलिए शांति को बाहर खोजने से पहले भीतर के कारणों पर ध्यान देना ज़रूरी है।
गीता 2.71 के अनुसार कामना, ममता और अहंकार छूटने पर शांति मिलती है, और गीता 18.53 कहती है कि जो अहंकार, बल के अभिमान, कामना, क्रोध और संग्रह की प्रवृत्ति छोड़कर ममता-रहित और शांत रहता है, वही ब्रह्म-भाव के योग्य बनता है। गीता 5.21 बताती है कि सच्चा स्थायी सुख बाहरी विषयों में नहीं, आत्मस्वरूप में स्थित होने से मिलता है, और गीता 2.66 में अशांत मन में सुख टिक नहीं सकता।
गीता 12.15 में जो न दूसरों को उद्विग्न करता है, न स्वयं विचलित होता है, वह भगवान् को प्रिय है, और गीता 2.65 में मन की निर्मल प्रसन्नता दुःखों को क्षीण करती और बुद्धि को स्थिर बनाती है। गीता 18.36 और 18.37 बताती हैं कि टिकाऊ सुख वही है जो अभ्यास से मिलता है और जो आरंभ में कठिन तथा अंत में अमृत-सा लगता है। दीर्घकालिक लाभ वाले अनुशासन, साधना और संयम को आरंभिक कठिनाई के कारण न छोड़ें।