साधुओं की रक्षा और धर्म की स्थापना
भगवान का अवतार साधुओं की रक्षा, अधर्म के विनाश और धर्म की पुनर्स्थापना के लिए होता है।
जीवन में उपयोग: जीवन में सद्गुणों की रक्षा और बुराइयों का त्याग करके धर्म की स्थापना अपने भीतर से आरम्भ करनी चाहिए।
15 श्लोक, अर्थ और जीवन में उपयोग सहित
धर्म की रक्षा पर भगवद्गीता के श्लोक 15 श्लोक, अर्थ और उपयोग सहित।
धर्म की रक्षा का अर्थ केवल किसी बाहरी लड़ाई या प्रतीक की रक्षा नहीं, बल्कि सत्य, न्याय और कर्तव्य के पक्ष में टिके रहने की तैयारी है। जब अन्याय सामने हो और भय या सुविधा हमें चुप रहने को कहे, तब यह प्रश्न सबसे बड़ा हो जाता है। गीता बताती है कि इसकी शुरुआत अपने भीतर के सद्गुणों की रक्षा और बुराइयों के त्याग से होती है, और फिर वही दृढ़ता व्यवहार में दिखती है।
गीता 4.7 और 4.8 में धर्म के पतन और अधर्म के प्रसार के समय साधुओं की रक्षा, अधर्म के विनाश और धर्म की पुनर्स्थापना की बात है, और सीख यह है कि अन्याय देखकर निराश होने के बजाय सत्य और सदाचार के पक्ष में दृढ़ रहें। गीता 2.31 कहती है कि स्वधर्म को स्पष्ट पहचान लेने के बाद भय और दुविधा से विचलित होना उचित नहीं, और गीता 2.37 में कर्तव्य स्पष्ट होने पर दृढ़ निश्चय से उठने की प्रेरणा है।
गीता 2.32 सामने आए धर्मपूर्ण कर्तव्य को सौभाग्य मानने को कहती है, और गीता 2.33 के अनुसार कर्तव्य से पलायन स्वधर्म, यश और नैतिक संतुलन की हानि है। गीता 1.19 में धर्म की निर्भय घोषणा अधर्म के पक्ष के भीतर भय और अशांति उत्पन्न कर देती है, क्योंकि अधर्म का आत्मविश्वास भीतर से खोखला होता है, और गीता 1.1 में पक्षपात की दृष्टि धर्म-दृष्टि को धुंधला करती है। निष्पक्ष विवेक से निर्णय लें।
भगवान का अवतार साधुओं की रक्षा, अधर्म के विनाश और धर्म की पुनर्स्थापना के लिए होता है।
जीवन में उपयोग: जीवन में सद्गुणों की रक्षा और बुराइयों का त्याग करके धर्म की स्थापना अपने भीतर से आरम्भ करनी चाहिए।
जब संसार में धर्म का पतन और अधर्म का प्रसार होता है, तब भगवान धर्म की पुनर्स्थापना के लिए अवतार ग्रहण करते हैं।
जीवन में उपयोग: अन्याय और अधर्म देखकर निराश होने के बजाय धर्म, सत्य और सदाचार के पक्ष में दृढ़ रहना चाहिए।
संजय का निष्कर्ष है कि जहाँ योगेश्वर श्रीकृष्ण का दिव्य मार्गदर्शन और अर्जुन का पुरुषार्थ, दोनों मिलते हैं, वहीं श्री, विजय, ऐश्वर्य और स्थिर नीति निवास करते हैं। ईश्वर-कृपा और मानवीय प्रयास का यह समन्वय गीता का समापन-संदेश है।
जीवन में उपयोग: सफलता के लिए पूर्ण प्रयास और ईश्वर पर श्रद्धा, दोनों को साथ रखें: कर्म में पुरुषार्थ और मार्गदर्शन में समर्पण।
कर्मयोग
दिव्य मार्गदर्शन और पुरुषार्थ का संगम ही विजय और कल्याण का आधार है।
धर्म
मोह से घिरी दृष्टि धर्मक्षेत्र में भी केवल 'मेरे' और 'उनके' का भेद देखती है।
ईश्वर का स्वरूप
वही अविनाशी परम ज्ञेय है, वही जगत का आश्रय और धर्म का रक्षक है।
कर्तव्य और उत्तरदायित्व
ज्ञान कर्तव्य से भागने का नहीं, उसे निभाने का बल देता है।
कर्तव्य और उत्तरदायित्व
कर्तव्य और अकर्तव्य की कसौटी शास्त्र है; उसे जानकर ही कर्म करो।
कर्तव्य और उत्तरदायित्व
कर्तव्य में दृढ़ निश्चय के साथ उठो, भय को पीछे छोड़ो।
कर्तव्य और उत्तरदायित्व
धर्मपूर्ण कर्तव्य का अवसर सौभाग्य से मिलता है।
कर्तव्य और उत्तरदायित्व
कर्तव्य के क्षण की दुर्बलता न यश देती है, न कल्याण।
कर्तव्य और उत्तरदायित्व
भय के कारण पीछे हटना सम्मान घटा देता है।
धर्म
धर्म की दृढ़ता के सामने अधर्म का बल भीतर से काँप जाता है।
कर्तव्य और उत्तरदायित्व
धर्म का आग्रह रखते हुए भी विरोधी को स्पष्टता से देखना आवश्यक है।
चुनौतियाँ
जीवन-क्षेत्र
गुण
आधुनिक संदर्भ
विषय