सांसारिक जीवन में सफलता की दौड़, संबंध, जिम्मेदारियाँ और सुख की तलाश साथ चलती हैं, और इसी बीच कई बार हम थक जाते हैं या दिशा खो देते हैं। गीता संसार को छोड़ देने का उपदेश नहीं देती, बल्कि उसमें रहते हुए सही दृष्टि और संतुलन सिखाती है: कौन-सा सुख टिकाऊ है, कौन-सा क्षणिक, और कर्तव्य निभाते हुए भी मन कैसे हल्का रखा जाए। इसकी शुरुआत अर्जुन के संसार-संबंधी द्वंद्व से होती है।
गीता 18.36, 18.38 और 18.39 सुख के तीन प्रकार बताती हैं: जो अभ्यास से रमता है और दुःखों का अंत करता है वह सात्त्विक, इन्द्रिय-विषयों से आरंभ में अमृत-सा पर अंत में विष-सा राजस, और निद्रा, आलस्य तथा प्रमाद से उत्पन्न तामस सुख जो आरंभ और अंत में मोह में डाले रखता है। इसलिए क्षणिक आकर्षण के बजाय ऐसे सुख को चुनें जो दीर्घकाल में शांति और उन्नति दे।
गीता 2.8 कहती है कि भौतिक संपत्ति और सत्ता भीतर के शोक का समाधान नहीं कर सकती, और गीता 15.2 में संसार-वृक्ष की शाखाएँ गुणों से पोषित होकर फैलती हैं तथा उसकी जड़ें मनुष्य को कर्मों के बंधन में बाँधती हैं। गीता 18.34 राजस धृति को फल की इच्छा से टिकी दृढ़ता बताती है, गीता 2.5 में अर्जुन का भावना में लिया पलायन-निर्णय सदैव विवेक नहीं होता, और गीता 18.78 के अनुसार जहाँ ईश्वरीय मार्गदर्शन और पुरुषार्थ दोनों मिलते हैं, वहीं विजय और स्थिर नीति रहती है।