जीवन प्रबंधन का अर्थ समय, ऊर्जा, रिश्ते, काम, स्वास्थ्य और मन, सबके बीच संतुलन बनाना है। यह केवल कार्यसूची बनाना नहीं, बल्कि यह तय करना है कि क्या ज़रूरी है और क्या नहीं। जब सब कुछ एक साथ चाहिए होता है, तो थकान और अधूरेपन की भावना बढ़ती है, और हम महत्वपूर्ण चीज़ें भी टालने लगते हैं।
गीता 6.17 और 6.16 संतुलित आहार, कर्म, नींद और जागरण को दुःख दूर करने वाला बताती हैं और किसी भी अति से बचने को कहती हैं। गीता 17.7 बताती है कि आहार, यज्ञ, तप और दान जैसी रुचियाँ गुणों के अनुसार भिन्न होती हैं, इसलिए अपनी आदतों को गुणों की कसौटी पर परखकर सात्त्विक दिशा में सुधारें। गीता 3.5 कहती है कि कोई भी क्षणभर बिना कर्म के नहीं रह सकता, इसलिए कर्म को सही दिशा और भाव देना ही उपाय है।
गीता 4.21 अनावश्यक संग्रह और परिणामों की चिंता छोड़कर आवश्यक कर्तव्यों पर ध्यान केंद्रित करने की सीख देती है, और गीता 18.11 कर्म छोड़ने के बजाय कर्मफल की आसक्ति छोड़ने को असली त्याग बताती है। गीता 6.2 बाहरी जीवनशैली बदलने से अधिक मन की इच्छाओं पर नियंत्रण को आवश्यक कहती है, और गीता 11.28 की नदियों की उपमा जीवन के परिवर्तन और अंत को प्रवाह की तरह स्वीकारने को कहती है। प्राथमिकताएँ तय करें और दिनचर्या को सरल रखें।