क्षमा पर भगवद्गीता

10 श्लोक, अर्थ और जीवन में उपयोग सहित

क्षमा पर भगवद्गीता के श्लोक 10 श्लोक, अर्थ और उपयोग सहित।

क्षमा का अर्थ यह नहीं कि जो हुआ उसे भूल जाएँ या गलत को सही मान लें, बल्कि मन में द्वेष और बदले की गाँठ को ढीला करना है। जब हम पुराने घावों को पकड़े रहते हैं, तब वे हमें ही थका देते हैं और रिश्तों में दूरी बनाए रखते हैं। गीता क्षमा को चरित्र का गुण मानती है, जो दूसरों को क्षमा करने के साथ अपनी भूलों के लिए विनम्रता से क्षमा माँगने में भी दिखता है।

गीता 16.3 क्षमा, धैर्य, शुद्धता, द्रोहहीनता और अभिमान-रहित जीवन को दैवी सम्पदा की पूर्णता बताती है, और गीता 12.13 में भक्त किसी से द्वेष नहीं करता, मित्रभाव और करुणा रखता है, ममता तथा अहंकार से मुक्त रहता है और दूसरों को क्षमा करता है। गीता 13.8 ज्ञान के लक्षणों में अभिमान का अभाव, अहिंसा, क्षमा और सरलता गिनाती है।

गीता 11.41, 11.42 और 11.44 में अर्जुन अपने पूर्व के सहज व्यवहार की सीमा पहचानकर विनम्रता से क्षमा माँगते हैं, और ईश्वर को पिता, मित्र और प्रिय के समान क्षमाशील मानते हैं। जहाँ अनजाने या असावधानी में किसी का अनादर हुआ हो, वहाँ विनम्रता से क्षमा माँगने से संबंध और अंतःकरण दोनों शुद्ध होते हैं। गीता 9.30 और 10.34 अतीत की गलतियों में न डूबने और क्षमा जैसे गुणों के विकास की सीख देती हैं।

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

क्षमा करने और भूल जाने में क्या अंतर है?
क्षमा द्वेष और बदले की गाँठ को ढीला करना है, जबकि भूल जाना स्मृति का प्रश्न है। गीता 12.13 में भक्त किसी से द्वेष नहीं करता और दूसरों को क्षमा करता है, पर इसका अर्थ अपने कर्तव्य और विवेक को छोड़ देना नहीं है। इसलिए प्रतिशोध की जगह क्षमा को स्थान दें और अपने निर्णय विवेक से लें।
अपनी गलती के लिए क्षमा माँगने में हिचक क्यों होती है?
क्योंकि इसमें अहंकार को झुकाना पड़ता है। गीता 11.42 में सच्चा भक्त अहंकार छोड़कर अपनी भूलों के लिए विनम्रता से क्षमा माँगता है, और इसी से संबंध तथा अंतःकरण दोनों शुद्ध होते हैं। जहाँ भी अनजाने या असावधानी में किसी का अनादर हुआ हो, वहाँ विनम्रता से क्षमा माँगना सीखें।
दूसरों को क्षमा करने से हमें क्या मिलता है?
गीता 16.3 में क्षमा, धैर्य और द्रोहहीनता दैवी चरित्र को पूर्ण करते हैं, यानी क्षमा हमारे अपने चरित्र और मन को हल्का तथा शुद्ध बनाती है। अपराध करने वालों के प्रति भी द्वेष न पालें, कठिन समय में धैर्य रखें और आत्मसम्मान को अहंकार में न बदलने दें।
गीता 9.30 में अतीत की गलतियों के प्रति क्षमा का भाव कैसे दिखता है?
गीता 9.30 के अनुसार पूर्व में चाहे कितने भी दोष रहे हों, सही निश्चय के साथ अनन्य भाव से लौटने वाले को साधु मानना चाहिए। इसकी सीख है कि अपने अतीत की गलतियों के अपराधबोध में न डूबें और दूसरों को भी केवल उनके अतीत से न आँकें; सही दिशा में दृढ़ निश्चय से लौटना ही असली परिवर्तन है।
क्षमा को रोज़ के रिश्तों में कैसे उतारें?
गीता 12.13 की सीख है कि अपने व्यवहार में द्वेष की जगह मित्रता, अहंकार की जगह विनम्रता और प्रतिशोध की जगह क्षमा को स्थान दें। गीता 11.41 की तरह प्रियजनों और श्रेष्ठजनों के प्रति अपने व्यवहार का समय-समय पर निरीक्षण करें और जहाँ असावधानी हुई हो, वहाँ विनम्र रहें।

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