आत्मज्ञान का अर्थ है स्वयं के वास्तविक स्वरूप को जानना, यानी मैं कौन हूँ और मेरा अनुभव किससे बनता है। हम अक्सर अपनी पहचान नाम, काम, रिश्तों और भावनाओं से जोड़ लेते हैं, और जब ये हिलते हैं तो हम भी हिल जाते हैं। आत्मज्ञान वह समझ है जो हमें इनसे अलग, भीतर के साक्षी तक ले जाती है, और जीवन में स्थिरता तथा स्पष्टता देती है।
गीता 2.29 कहती है कि आत्मतत्त्व इतना सूक्ष्म और अद्भुत है कि उसे देखने, कहने या सुनने वाले भी बहुत कम लोग उसे यथार्थ रूप में जान पाते हैं, इसलिए उसे केवल सुनने या चर्चा तक सीमित न रखकर धैर्यपूर्वक साधना और अनुभव से समझें। गीता 5.8 में तत्त्वज्ञानी समझता है कि आत्मा वास्तव में कर्म नहीं करती, शरीर और इन्द्रियाँ अपनी क्रियाएँ करती हैं, और इससे साक्षीभाव विकसित होता है।
गीता 5.15 बताती है कि अज्ञान ही जीव को वास्तविक स्वरूप से दूर कर मोह में रखता है, और गीता 5.16 के अनुसार जब अज्ञान नष्ट होता है तब ज्ञान सूर्य की तरह प्रकाश करता है। गीता 4.35 में ज्ञान से मोह मिटकर सबमें एकत्व का दर्शन होता है, गीता 4.24 में ब्रह्मदृष्टि वाला साधक समस्त कर्मों में एक ही परम सत्य का अनुभव करता है, और गीता 2.11 आत्मज्ञान को शोक और मोह की जड़ काटने वाला बताती है।