हम जो खाते हैं, जैसे जीते हैं और जैसी दिनचर्या रखते हैं, उसका असर शरीर के साथ मन, स्वभाव और एकाग्रता पर भी पड़ता है। देर रात तक जागना, बिना सोचे खाना और हर समय उत्तेजना की तलाश करना धीरे-धीरे थकान और बेचैनी में बदलता है। गीता आहार और जीवनशैली को साधना से अलग नहीं, उसकी नींव मानती है, और अति के बजाय संतुलन सिखाती है।
गीता 6.17 संतुलित आहार-विहार, कर्म, नींद और जागरण को दुःख दूर करने वाला बताती है, और गीता 6.16 कहती है कि भोजन, निद्रा या दिनचर्या में किसी भी अति से साधना बाधित होती है। गीता 4.30 संयमित आहार और अनुशासित जीवन को साधना की मज़बूत नींव कहती है, और गीता 17.7 बताती है कि आहार, यज्ञ, तप और दान की रुचियाँ गुणों के अनुसार भिन्न होती हैं, इसलिए पहचान से ही सुधार आरंभ होता है।
गीता 17.8 आयु, बुद्धि, बल और आरोग्य बढ़ाने वाले रसयुक्त, स्निग्ध और मन को प्रिय आहार को सात्त्विक बताती है, गीता 17.9 अति कड़वे, खट्टे, तीखे और जलन पैदा करने वाले आहार को राजसी कहकर दुःख और रोग की ओर ले जाने वाला बताती है, और गीता 17.10 बासी, रसहीन और अपवित्र भोजन को तामसी, जो जड़ता बढ़ाता है। गीता 18.52 ध्यान के अनुकूल जीवनशैली में थोड़ा एकांत, संयमित आहार और वाणी-शरीर-मन का नियंत्रण बताती है।