अकर्म का अर्थ कुछ न करना नहीं है। गीता में अकर्म वह स्थिति है जिसमें कर्म होता है, पर कर्ता का अहंकार और फल की आसक्ति उसे बाँधती नहीं। कई लोग निष्क्रिय बैठकर सोचते हैं कि वे मुक्त हैं, जबकि भीतर की बेचैनी और कामना चलती रहती है, और कुछ लोग दिन-रात काम करते हुए भी भीतर से शांत और स्वतंत्र रहते हैं। यही अंतर अकर्म को समझने की कुंजी है।
गीता 4.18 में सच्चा ज्ञानी कर्म में अकर्म और अकर्म में कर्म देखता है, यानी बाहरी क्रियाओं से परे कर्म के वास्तविक तत्त्व को समझता है और कर्म करते हुए भी बंधन से मुक्त रहता है। गीता 3.4 के अनुसार बाहरी रूप से कर्म छोड़ देना न मुक्ति देता है न सिद्धि, और गीता 3.5 कहती है कि कोई क्षणभर भी बिना कर्म के नहीं रह सकता, इसलिए प्रश्न कर्म छोड़ने का नहीं, उसका स्वरूप सुधारने का है।
गीता 9.9 बताती है कि भगवान् सृष्टि-कर्म करते हुए भी उनमें आसक्ति-रहित रहते हैं, इसलिए कर्म नहीं, आसक्ति बाँधती है। गीता 13.30 और 5.9 के अनुसार शरीर, मन और इन्द्रियों के सब कर्म प्रकृति द्वारा सम्पन्न होते हैं और आत्मा साक्षी है, इसलिए 'मैंने किया' के अहंकार और सफलता-असफलता के बोझ को हल्का करें। गीता 3.8 नियत कर्तव्य के पालन को निष्क्रियता से श्रेष्ठ बताती है, और गीता 18.7 मोह से किए गए कर्तव्य-त्याग को तामसिक कहती है।