अकर्म पर भगवद्गीता

13 श्लोक, अर्थ और जीवन में उपयोग सहित

अकर्म पर भगवद्गीता के श्लोक 13 श्लोक, अर्थ और उपयोग सहित।

अकर्म का अर्थ कुछ न करना नहीं है। गीता में अकर्म वह स्थिति है जिसमें कर्म होता है, पर कर्ता का अहंकार और फल की आसक्ति उसे बाँधती नहीं। कई लोग निष्क्रिय बैठकर सोचते हैं कि वे मुक्त हैं, जबकि भीतर की बेचैनी और कामना चलती रहती है, और कुछ लोग दिन-रात काम करते हुए भी भीतर से शांत और स्वतंत्र रहते हैं। यही अंतर अकर्म को समझने की कुंजी है।

गीता 4.18 में सच्चा ज्ञानी कर्म में अकर्म और अकर्म में कर्म देखता है, यानी बाहरी क्रियाओं से परे कर्म के वास्तविक तत्त्व को समझता है और कर्म करते हुए भी बंधन से मुक्त रहता है। गीता 3.4 के अनुसार बाहरी रूप से कर्म छोड़ देना न मुक्ति देता है न सिद्धि, और गीता 3.5 कहती है कि कोई क्षणभर भी बिना कर्म के नहीं रह सकता, इसलिए प्रश्न कर्म छोड़ने का नहीं, उसका स्वरूप सुधारने का है।

गीता 9.9 बताती है कि भगवान् सृष्टि-कर्म करते हुए भी उनमें आसक्ति-रहित रहते हैं, इसलिए कर्म नहीं, आसक्ति बाँधती है। गीता 13.30 और 5.9 के अनुसार शरीर, मन और इन्द्रियों के सब कर्म प्रकृति द्वारा सम्पन्न होते हैं और आत्मा साक्षी है, इसलिए 'मैंने किया' के अहंकार और सफलता-असफलता के बोझ को हल्का करें। गीता 3.8 नियत कर्तव्य के पालन को निष्क्रियता से श्रेष्ठ बताती है, और गीता 18.7 मोह से किए गए कर्तव्य-त्याग को तामसिक कहती है।

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13.30

कर्म और अकर्म

सब कर्म प्रकृति द्वारा हो रहे हैं और आत्मा अकर्ता है, यह देखने वाला ही यथार्थ देखता है

कर्म प्रकृति करती है, आत्मा साक्षी है; यह दृष्टि कर्तापन के बोझ से मुक्त करती है।

गीता में कहाँ

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आधुनिक संदर्भ

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

गीता 9.9 में सृष्टि-कर्म करते हुए भी भगवान् का कर्म से न बँधना क्या सिखाता है?
गीता 9.9 के अनुसार भगवान् उन कर्मों में उदासीन के समान स्थित और आसक्ति-रहित रहते हैं, इसलिए सृष्टि-संबंधी कर्म उन्हें नहीं बाँधते; बंधन आसक्ति से होता है, कर्म मात्र से नहीं। कर्तव्य कर्म पूरी निष्ठा से करें, पर परिणाम और कर्तृत्व के अभिमान में आसक्त न हों। कर्म नहीं, आसक्ति बाँधती है।
गीता 13.30 में सब कर्म प्रकृति द्वारा होने की दृष्टि से कर्तापन का बोझ कैसे घटता है?
गीता 13.30 के अनुसार शरीर, मन और इन्द्रियों द्वारा होने वाले सभी कर्म प्रकृति से ही सम्पन्न होते हैं, जबकि आत्मा स्वभाव से अकर्ता है, और जो ऐसा देखता है वही सही देखता है। अपने कर्तव्य पूरी निष्ठा से करें, पर 'मैंने किया' के अहंकार और सफलता-असफलता के बोझ को हल्का करें, और स्वयं को साक्षी मानकर शांत मन से कार्य करें।
गीता 5.9 में इन्द्रियाँ अपने विषयों में प्रवृत्त हैं का क्या अर्थ है?
गीता 5.9 के अनुसार ज्ञानी समझता है कि सभी शारीरिक और मानसिक क्रियाएँ प्रकृति और इन्द्रियों द्वारा होती हैं, आत्मा उनसे परे है। अपने कार्यों को साक्षीभाव से देखें और अहंकारपूर्ण 'मैं ही सब कर रहा हूँ' की भावना को कम करें। इन्द्रियाँ कार्य करती हैं, आत्मा केवल साक्षी रहती है।
अकर्म का अर्थ निष्क्रियता क्यों नहीं है?
गीता 3.4 के अनुसार बाहरी रूप से कर्म छोड़ देना न तो कर्मबंधन से मुक्ति देता है और न सिद्धि; मुक्ति कर्म के प्रति भाव और आसक्ति के त्याग से मिलती है। गीता 3.8 भी नियत कर्तव्य के पालन को निष्क्रियता से श्रेष्ठ बताती है। इसलिए कर्तव्यों से भागने के बजाय उन्हें अनासक्त भाव से करना अकर्म की सही दिशा है।
कर्म करते हुए भी अकर्म की स्थिति कैसे साधें?
गीता 4.18 के अनुसार सच्चा ज्ञानी कर्म के वास्तविक तत्त्व को समझकर कर्म करते हुए भी बंधन से मुक्त रहता है। इसके लिए अपने कार्य को उद्देश्य, चेतना और आंतरिक स्थिति के साथ करें, कर्तापन का अभिमान घटाएँ और परिणाम की पकड़ ढीली रखें। गीता 9.9 की तरह कर्म और आसक्ति के बीच अंतर पहचानना यही अभ्यास है।

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