विकर्म का अर्थ है ऐसा कर्म जो नैतिक रूप से अनुचित हो और स्वयं तथा दूसरों के लिए हानिकारक बने: झूठ, छल, क्रूरता, शोषण या किसी को आहत करने वाला व्यवहार। कभी हम इन्हें परिस्थितियों का बहाना देकर सही ठहरा लेते हैं, पर बार-बार दोहराने से यही आदत स्वभाव बन जाती है। इसलिए गीता कर्म को बाहरी रूप से नहीं, उसकी भावना और परिणाम से परखना सिखाती है।
गीता 4.16 और 4.17 कहती हैं कि कर्म, अकर्म और विकर्म का भेद समझना आध्यात्मिक प्रगति के लिए ज़रूरी है, यानी निर्णय लेते समय केवल यह न देखें कि क्या किया जा रहा है, बल्कि यह भी कि वह उचित है या नहीं। गीता 16.4 में दम्भ, दर्प, अभिमान, क्रोध, कठोर व्यवहार और अज्ञान आसुरी प्रकृति के लक्षण हैं, और गीता 16.9 में गलत जीवन-दृष्टि वाले लोग उग्र कर्मों से स्वयं तथा संसार के अहित का कारण बनते हैं।
गीता 16.10 बताती है कि अतृप्त कामना, दम्भ और मद से भरे लोग मोह के कारण दूषित आग्रह पकड़ लेते हैं, और गीता 16.16 में भोगों में आसक्त और मोह-जाल में बँधे लोग दुःखदायी अवस्था को पहुँचते हैं। गीता 16.19 और 16.20 चेताती हैं कि द्वेष और क्रूरता का फल अधोगति है और गलत प्रवृत्तियों को न बदलने पर पतन की गति बढ़ती जाती है। आज का आचरण कल की प्रवृत्ति बनता है, इसलिए सुधार समय रहते करें।