लोभ पर भगवद्गीता

29 श्लोक, अर्थ और जीवन में उपयोग सहित

"लोभ" में सहायक भगवद्गीता के श्लोक 29 श्लोक, अर्थ, मूल शिक्षा और व्यावहारिक उपयोग सहित।

लोभ वह लालसा है जो जितना मिले उससे कभी तृप्त नहीं होती। वेतन बढ़ता है तो खर्च बढ़ते हैं, घर बड़ा होता है तो और बड़े की चाह जगती है। लोभ में व्यक्ति वर्तमान की उपलब्धियों का आनंद नहीं ले पाता, तुलना में उलझा रहता है और कभी-कभी सही-गलत की रेखा भी भूलने लगता है।

गीता 16.13 में आसुरी प्रवृत्ति वाला व्यक्ति 'आज यह पाया, कल वह पाऊँगा' की योजना बनाता रहता है और कभी संतुष्ट नहीं होता। गीता 16.12 बताती है कि अनगिनत आशाओं से बँधा मनुष्य काम और क्रोध के अधीन होकर अन्याय से भी धन-संग्रह करने लगता है। गीता 14.12 लोभ और बेचैनी को रजोगुण की वृद्धि का लक्षण कहती है, और गीता 18.27 में लोभी, फलाकांक्षी कर्ता हर्ष-शोक में डूबता-उतरता रहता है।

गीता 12.14 सदा संतुष्ट, संयमी और दृढ़ निश्चयी भक्त को प्रिय बताती है, और गीता 4.21 में फल की आशा तथा संग्रह की प्रवृत्ति छोड़कर कर्तव्य करने वाला बन्धन में नहीं पड़ता। गीता 6.8 के अनुसार ज्ञान और अनुभव से तृप्त योगी वस्तुओं के आकर्षण से प्रभावित नहीं होता, और गीता 1.45 में अर्जुन अपने लक्ष्य के पीछे की कामना को जाँचते हैं। प्राप्त के प्रति कृतज्ञ रहें और साधनों की शुद्धता का ध्यान रखें।

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

गीता के अनुसार लोभ को कैसे कम करें?
संतोष, संयम और कृतज्ञता से। गीता 12.14 में सदा संतुष्ट रहने वाला भक्त भगवान् को प्रिय है, और गीता 4.21 में अनावश्यक संग्रह और फल की आशा छोड़कर कर्तव्य करने वाला बंधन में नहीं पड़ता। जो मिला है उसके प्रति कृतज्ञ रहें और अधिक पाने की होड़ में वर्तमान के संतोष को न खोएँ।
गीता 16.13 में कभी न मिटने वाली लालसा का क्या अर्थ है?
गीता 16.13 में आसुरी प्रवृत्ति वाला व्यक्ति पाई हुई वस्तु पर संतुष्ट नहीं होता; वह हर उपलब्धि के बाद और अधिक पाने की योजना बनाता रहता है और संग्रह को ही अपनी पहचान बना लेता है। इसका सार है कि जिसे कभी पर्याप्त नहीं लगता, उसकी लालसा कभी शांत नहीं होती।
गीता 12.14 में संतोष और भक्ति का क्या संबंध है?
गीता 12.14 के अनुसार जो भक्त हर परिस्थिति में संतुष्ट रहता है, मन-इन्द्रियों को संयम में रखता है और दृढ़ निश्चय से अपना मन-बुद्धि भगवान् को अर्पित करता है, वह उन्हें प्रिय है। यानी भक्ति का आधार भीतर की तृप्ति और अटल निश्चय है, जो लोभ को टिकने नहीं देता।
गीता 16.12 के अनुसार अनियंत्रित आशा हमें कहाँ ले जाती है?
गीता 16.12 बताती है कि अनगिनत आशाओं की डोरियों से बँधा मनुष्य काम और क्रोध के अधीन हो जाता है और भोग-सुख के लिए अन्याय के रास्ते से भी धन जुटाने लगता है। इसलिए धन कमाते समय साधनों की शुद्धता का ध्यान रखें और कोई भी लक्ष्य नैतिकता की कीमत पर न चुनें।
गीता 14.12 में लोभ को रजोगुण का लक्षण क्यों कहा गया है?
गीता 14.12 में लोभ, कर्मों का आरंभ, अशांति और विषयों की लालसा को रजोगुण की वृद्धि के लक्षण बताया गया है। जब मन में अधिक पाने की होड़, बेचैनी और लालच बढ़े, तब यह संकेत है कि रुककर संतोष और संयम का अभ्यास करना चाहिए।

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