संतोष एक ऐसा गुण है जिसे अभ्यास से बढ़ाया जा सकता है: जो मिला है उसमें पर्याप्तता का भाव रखना, पर आगे बढ़ने का उत्साह खोए बिना। जो हर उपलब्धि के बाद नई बेचैनी में चला जाता है, उसकी शांति हमेशा आगे खिसकती रहती है, और जो संतोष सीख लेता है, वह प्रयास करते हुए भी हल्का रहता है। गीता संतोष को आत्मिक तृप्ति और कामना के स्वरूप को समझने से जोड़ती है।
गीता 5.21 कहती है कि सच्चा और स्थायी सुख बाहरी विषयों में नहीं, आत्मस्वरूप में स्थित होने से मिलता है, इसलिए क्षणिक मनोरंजन और बाहरी उपलब्धियों के पीछे भागने के बजाय भीतर की शांति और संतोष को विकसित करें। गीता 5.24 के अनुसार जिसका आनंद और प्रकाश भीतर से उत्पन्न होता है, वह परम शांति का अनुभव करता है, और गीता 3.17 में आत्मतृप्त व्यक्ति बाहरी वस्तुओं पर निर्भर नहीं रहता।
गीता 3.39 बताती है कि कामना भोग से कभी शांत नहीं होती, बल्कि अग्नि में घी की तरह और बढ़ती है, इसलिए और अधिक पाने की दौड़ में रुककर देखें कि कितना पर्याप्त है। गीता 2.55 में कामनाएँ छोड़कर आत्मा में संतुष्ट रहना स्थिरबुद्धि का लक्षण है, गीता 2.8 कहती है कि बाहरी ऐश्वर्य भीतर का शोक नहीं मिटा सकता, और गीता 12.14 तथा 12.19 में सदा संतुष्ट, संयमी और निन्दा-स्तुति में सम भक्त स्थिर बुद्धि का है।