आध्यात्मिक ज्ञान का अर्थ यह नहीं कि बहुत से शास्त्र याद हों, बल्कि यह कि जीवन की दिशा और दृष्टि सत्य के अनुरूप हो। बहुत जानने वाला भी अशांत हो सकता है, और कम जानने वाला भी शांत रह सकता है, यदि उसकी समझ भीतर उतरी हो। इसलिए गीता ज्ञान की स्पष्ट कसौटी देती है, ताकि हम जान सकें कि हमारी समझ कितनी गहरी है।
गीता 13.12 के अनुसार आत्मा-परमात्मा संबंधी ज्ञान में निरंतर स्थित रहना और तत्त्वज्ञान के लक्ष्य परमात्मा का दर्शन करना ज्ञान है, और इससे विपरीत जो कुछ है, वह अज्ञान है। गीता 9.2 इस ज्ञान को सब विद्याओं में श्रेष्ठ, पवित्र, प्रत्यक्ष अनुभव कराने वाला, साधने में सरल और कभी नष्ट न होने वाला बताती है। गीता 4.38 ज्ञान को सर्वोच्च शुद्धिकारक कहती है।
गीता 4.37 में ज्ञानाग्नि संचित कर्मबंधनों और अज्ञानजनित बंधनों को नष्ट करती है, और गीता 4.36 के अनुसार ज्ञान अतीत की भूलों से ऊपर उठाकर मुक्ति की दिशा में ले जा सकता है। गीता 4.33 ज्ञानयज्ञ को बाहरी साधनों से श्रेष्ठ कहती है, और गीता 7.19 बताती है कि अनेक जन्मों की साधना के बाद ज्ञान परिपक्व होता है। गीता 18.63 पूरी तरह विचारकर अपने विवेक से निर्णय लेने की स्वतंत्रता देती है, इसलिए ज्ञान को आँख मूँदकर नहीं, समझकर अपनाएँ।