मृत्यु का भय लगभग हर मनुष्य के भीतर कहीं न कहीं रहता है: अपनी मृत्यु का, या अपनों को खो देने का। बीमारी, बढ़ती उम्र या किसी हादसे के बाद यह अचानक तेज़ हो सकता है। जिस विषय पर बात करना कठिन लगता है, उसी का डर मन में चुपचाप बना रहता है और वर्तमान के सुख को भी धुंधला कर देता है।
गीता मृत्यु को अंत नहीं, परिवर्तन बताती है। गीता 2.20 में आत्मा अजन्मा, नित्य और शाश्वत है, और शरीर के नाश से उसका नाश नहीं होता। गीता 2.22 पुराने वस्त्र त्यागकर नए धारण करने की उपमा देती है, और गीता 2.17 के अनुसार जिससे सम्पूर्ण जगत् व्याप्त है, वह अविनाशी है। गीता 2.27 कहती है कि जो अटल है, उसके लिए शोक करना ज्ञानी का लक्षण नहीं।
गीता 8.6 बताती है कि जीवनभर जिस भाव में मन रमा रहता है, वही अंत समय में उभरता है, इसलिए रोज़ की सोच, संगति और आदतें सावधानी से चुनें। गीता 8.5 और 8.13 अंत समय में ईश्वर-स्मरण की बात करती हैं, और गीता 12.7 में जिनका चित्त भगवान् में स्थिर है, उन्हें भगवान् शीघ्र पार लगाते हैं। स्मरण को आज का अभ्यास बनाएँ, अंतिम समय की प्रतीक्षा न करें।