कृतज्ञता पर भगवद्गीता

40 श्लोक, अर्थ और जीवन में उपयोग सहित

कृतज्ञता गुण पर भगवद्गीता के श्लोक 40 श्लोक, अर्थ और उपयोग सहित।

कृतज्ञता एक ऐसा गुण है जो अभ्यास से गहरा होता है: जो हमें मिला है, उसे केवल अपनी योग्यता का फल न मानकर उसके पीछे के लोगों, प्रकृति और बड़ी व्यवस्था को पहचानना। कृतज्ञ व्यक्ति अधिक संतुष्ट रहता है, अहंकार से बचता है और दूसरों के लिए भी सहज रूप से देने वाला बनता है। गीता कृतज्ञता को अर्पण, परस्पर पोषण और सृष्टि में ईश्वर की शक्ति के बोध से जोड़ती है।

गीता 3.12 कहती है कि प्राप्त सुख-साधन ईश्वर और समाज की देन हैं, इसलिए कृतज्ञता और अर्पण के बिना केवल भोग करना अनुचित है, और अपनी आय तथा सामर्थ्य में से कुछ भाग दूसरों की सेवा में अवश्य लगाएँ। गीता 3.11 और 3.10 बताती हैं कि सृष्टि परस्पर निर्भरता और देने के भाव पर चलती है, जबकि गीता 3.14 के अनुसार जीवन का पोषण अन्न, वर्षा और कर्म के जुड़े चक्र से होता है, इसलिए अपने कर्मों का प्रभाव प्रकृति और समाज पर समझकर जिम्मेदारी से कार्य करें।

गीता 15.12 में सूर्य, चन्द्र और अग्नि का तेज परमात्मा की ही शक्ति है, इसलिए प्रकृति की हर चमक में ईश्वर की शक्ति देखना सीखें; इससे अहंकार घटता और कृतज्ञता बढ़ती है। गीता 15.13 में भोजन, जल और प्रकृति ईश्वर की पालनकारी शक्ति का प्रसाद हैं, गीता 10.6 में अपनी परम्परा और पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता रखने की सीख है, और गीता 18.75 में संजय गुरु-कृपा से ज्ञान सुनने का सौभाग्य मानते हैं।

इन श्लोकों से शुरू करें

सभी 40 श्लोक

गीता में कहाँ

संबंधित विषय

जीवन-क्षेत्र

विषय

गुण

आधुनिक संदर्भ

चुनौतियाँ

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

कृतज्ञता का गुण रोज़ के जीवन में कैसे बढ़ाएँ?
गीता 3.12 की सीख है कि जो पाया है, उसमें से लौटाना ही कृतज्ञता है। अपनी आय, सुविधाओं और सामर्थ्य में से कुछ भाग दूसरों की सेवा और कल्याण के लिए अवश्य लगाएँ, और रोज़ एक बार उन लोगों और साधनों को याद करें जिनके कारण आपका जीवन चल रहा है। इससे अहंकार घटता और संतोष बढ़ता है।
गीता 15.12 के अनुसार प्रकृति की हर चमक में कृतज्ञता कैसे रखें?
गीता 15.12 के अनुसार जगत् को प्रकाशित करने वाला सूर्य, चन्द्र और अग्नि का तेज स्वतंत्र नहीं, बल्कि परमात्मा की ही शक्ति है। इसलिए प्रकृति की हर चमक, चाहे सुबह की धूप हो या चाँदनी, में ईश्वर की शक्ति देखना सीखें; इससे अहंकार घटता है और कृतज्ञता बढ़ती है। जगत् का प्रत्येक प्रकाश उसी परम प्रकाश की झलक है।
गीता 15.13 में भोजन, जल और प्रकृति को ईश्वर का प्रसाद मानने का क्या अर्थ है?
गीता 15.13 के अनुसार परमात्मा अपनी शक्ति से पृथ्वी में प्रविष्ट होकर सब प्राणियों को आधार देते हैं और रसस्वरूप चन्द्रमा बनकर औषधियों का पोषण करते हैं। इसलिए भोजन, जल और प्रकृति को केवल संसाधन नहीं, ईश्वर की पालनकारी शक्ति का प्रसाद मानें और उनका सम्मानपूर्वक उपयोग करें।
गीता 3.14 के अनुसार हमारे कर्मों का प्रकृति और समाज से क्या संबंध है?
गीता 3.14 के अनुसार जीवन का पोषण एक परस्पर जुड़े चक्र से होता है, जिसकी धुरी कर्तव्य-भाव से किया गया कर्म और यज्ञ है। इसलिए यह समझें कि हमारे प्रत्येक कर्म का प्रभाव प्रकृति और समाज पर पड़ता है और जिम्मेदारी से कार्य करें। सृष्टि का चक्र कर्तव्य-भाव से किए गए कर्म पर टिका है, और इसके प्रति आभार भी कृतज्ञता का रूप है।
गीता 10.6 में परम्परा और पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता का क्या अर्थ है?
गीता 10.6 में सप्तर्षि और चार मनु भगवान् के संकल्प से उत्पन्न बताए गए हैं, यानी सृष्टि की ऋषि-मनु परम्परा और समस्त प्रजा का मूल स्रोत परमात्मा का संकल्प है। इसलिए अपनी परम्परा और पूर्वजों के प्रति कृतज्ञ रहें तथा स्वयं को बड़ी सृष्टि-व्यवस्था का अंग मानें।

एक्सप्लोरर में फ़िल्टर करें

भगवद्गीता खोजें

← गुण