प्रकृति का अर्थ गीता में केवल बाहरी पर्यावरण नहीं, बल्कि वह पूरा तंत्र है जिसमें शरीर, मन, बुद्धि, स्वभाव और तीनों गुण शामिल हैं, और जो हमारे विचार, कर्म और मनोदशा को लगातार प्रभावित करता है। जब हम इन परिवर्तनशील अवस्थाओं को ही अपनी पहचान मान लेते हैं, तब उनके उतार-चढ़ाव के साथ हम भी डगमगाते हैं। गीता इस तंत्र को समझने और उससे साक्षी की तरह जुड़ने की सीख देती है।
गीता 3.27 कहती है कि कर्म प्रकृति के गुणों से होते हैं, पर अहंकार के कारण मनुष्य स्वयं को कर्ता मान बैठता है, और गीता 3.5 के अनुसार प्रकृति के गुणों के प्रभाव से जीव निरंतर कर्म में लगा रहता है, इसलिए पूर्ण निष्क्रियता संभव नहीं; कर्म का स्वरूप सुधारना ही उपाय है। गीता 14.5 बताती है कि सत्त्व, रज और तम ये तीनों गुण प्रकृति से उत्पन्न होते हैं और अविनाशी जीवात्मा को शरीर तथा उसके अनुभवों से बाँध देते हैं।
गीता 13.20 के अनुसार शरीर, मन और इन्द्रियों के सभी विकार तथा गुण प्रकृति से उत्पन्न होते हैं, इसलिए इन विकारों को आत्मा का मूल स्वभाव न मानें। गीता 3.33 बताती है कि संस्कार और स्वभाव का प्रभाव प्रबल है, इसलिए केवल दमन पर्याप्त नहीं; स्वभाव को विवेक और अभ्यास से शुद्ध करना होगा। गीता 7.14 में गुणमयी माया को अपने प्रयास से पार करना कठिन है, पर भगवान् की शरण लेने वाले उसे सरलता से पार करते हैं, और गीता 2.45 गुणों से ऊपर उठकर आत्मवान बनने को कहती है।