पवित्रता पर भगवद्गीता

41 श्लोक, अर्थ और जीवन में उपयोग सहित

पवित्रता गुण पर भगवद्गीता के श्लोक 41 श्लोक, अर्थ और उपयोग सहित।

पवित्रता एक ऐसा गुण है जिसे रोज़ के आचरण से बढ़ाया जाता है: विचारों में सच्चाई, वाणी में मधुरता, भोजन में शुद्धता और कर्म में अपेक्षा-रहित भाव। केवल बाहरी स्वच्छता से मन निर्मल नहीं होता, और केवल भीतर की बात करके व्यवहार की अनदेखी भी ठीक नहीं। गीता पवित्रता को बाहरी और भीतरी, दोनों स्तरों की शुद्धता मानकर चित्त की शुद्धि को सबसे महत्वपूर्ण बताती है।

गीता 15.11 कहती है कि आत्मदर्शन के लिए केवल प्रयास पर्याप्त नहीं, अन्तःकरण की शुद्धि और विवेक भी आवश्यक हैं, इसलिए साधना में चित्त-शुद्धि को प्राथमिकता दें: सत्य आचरण, संयम और स्वाध्याय के बिना केवल बाहरी प्रयास फल नहीं देता। गीता 17.14 में बड़ों का आदर, पवित्रता, सरलता, संयम और अहिंसा शरीर का तप है, और गीता 17.10 में बासी और अपवित्र भोजन जड़ता की ओर ले जाता है।

गीता 10.31 में पवित्र करने वालों में वायु, शस्त्रधारियों में राम और नदियों में गंगा भगवान् की विभूति हैं, इसलिए मन, वाणी और कर्म की शुद्धि पर ध्यान दें और अपनी शक्ति को मर्यादा और धर्म के भीतर रखकर उपयोग करें। गीता 10.35 मंत्र, छन्द और ऋतुओं की सुंदरता में ईश्वर की उपस्थिति देखकर कृतज्ञता और आनंद बढ़ाने को कहती है, और गीता 3.13 के अनुसार बाँटकर ग्रहण करने वाला शुद्ध होता है। गीता 12.16 और 7.9 में अपेक्षा-रहित कर्म और गुणों के प्रति कृतज्ञता पवित्रता को सुदृढ़ करते हैं।

इन श्लोकों से शुरू करें

सभी 41 श्लोक

गीता में कहाँ

संबंधित विषय

जीवन-क्षेत्र

विषय

आधुनिक संदर्भ

चुनौतियाँ

गुण

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

गीता 15.11 में चित्त-शुद्धि को आत्मदर्शन के लिए क्यों आवश्यक कहा गया?
गीता 15.11 के अनुसार आत्मदर्शन के लिए केवल प्रयास पर्याप्त नहीं; अन्तःकरण की शुद्धि और विवेक भी आवश्यक हैं, इसीलिए यत्नशील योगी आत्मा को देखते हैं जबकि अशुद्ध चित्त वाले नहीं देख पाते। साधना में चित्त-शुद्धि को प्राथमिकता दें: सत्य आचरण, संयम और स्वाध्याय के बिना केवल बाहरी प्रयास फल नहीं देता।
गीता 10.31 में शुद्धि और मर्यादित शक्ति का क्या संबंध है?
गीता 10.31 के अनुसार पवित्र करने वालों में वायु, शस्त्रधारियों में राम और नदियों में गंगा भगवान् की विभूति हैं, यानी शुद्धि, मर्यादित पराक्रम और प्रवाह की श्रेष्ठ शक्तियों में भी ईश्वर की शक्ति प्रकट होती है। इसलिए मन, वाणी और कर्म की शुद्धि पर ध्यान दें और अपनी शक्ति को मर्यादा और धर्म के भीतर रखकर उपयोग करें।
गीता 10.35 में मंत्र, छन्द और ऋतुओं में ईश्वर की उपस्थिति से क्या सीख मिलती है?
गीता 10.35 के अनुसार पवित्र मंत्र, श्रेष्ठ छन्द तथा सृजन और आनंद की ऋतुओं में भी भगवान् की विभूति प्रकट होती है। इसलिए मंत्र-स्मरण, प्रकृति के चक्र और ऋतुओं की सुंदरता में ईश्वर की उपस्थिति देखकर जीवन में कृतज्ञता और आनंद बढ़ाएँ। मंत्र, छन्द और ऋतु, सबमें परमात्मा की सुंदरता झलकती है।
पवित्रता का गुण रोज़ के आचरण में कैसे बढ़ाएँ?
गीता 17.14 के अनुसार अपने आचरण में बड़ों और गुरुजनों का सम्मान, स्वच्छता, सरलता, संयम और दूसरों को कष्ट न देने का भाव अपनाएँ। गीता 3.13 की तरह भोजन और संसाधनों को पहले बाँटने या अर्पित करने की आदत डालें, जिससे स्वार्थ घटे और संतोष बढ़े। छोटे दैनिक आचरण ही पवित्रता की नींव बनाते हैं।
बाहरी स्वच्छता और भीतरी पवित्रता को कैसे जोड़ें?
गीता 17.10 के अनुसार ताज़ा, स्वच्छ और शुद्ध भोजन अपनाएँ तथा बासी, अस्वच्छ और जड़ता बढ़ाने वाली आदतों से बचें, यह बाहरी शुद्धता का अंग है। साथ ही गीता 15.11 की सीख से चित्त-शुद्धि को प्राथमिकता दें, यानी सत्य आचरण, संयम और स्वाध्याय अपनाएँ। बाहरी और भीतरी, दोनों स्तर साथ चलने पर पवित्रता टिकाऊ बनती है।

एक्सप्लोरर में फ़िल्टर करें

भगवद्गीता खोजें

← गुण