आत्मा गीता का केंद्रीय विषय है, क्योंकि जीवन के अधिकांश भय, शोक और भ्रम हमारी पहचान से जुड़े हैं: मैं शरीर हूँ या उससे परे कुछ? जब हम स्वयं को शरीर, पद और परिस्थितियों तक सीमित मानते हैं, तब हर परिवर्तन खतरे जैसा लगता है। गीता आत्मा को नित्य, अपरिवर्तनीय और साक्षी बताकर इस भय का आधार बदल देती है और जीवन को अधिक स्थिर दृष्टि से देखने का रास्ता खोलती है।
गीता 2.20 में आत्मा किसी काल में उत्पन्न या नष्ट नहीं होती; वह अजन्मा, नित्य, शाश्वत और पुरातन है, और गीता 2.12 के अनुसार भूत, वर्तमान और भविष्य में उसका अस्तित्व बना रहता है। गीता 2.22 मृत्यु को पुराने वस्त्र बदलने जैसा परिवर्तन बताती है, और गीता 2.11 कहती है कि ज्ञानी देह के नाशवान स्वरूप को जानकर शोक नहीं करता, क्योंकि आत्मज्ञान शोक और मोह की जड़ को काटता है।
गीता 6.20 और 6.21 बताती हैं कि योगाभ्यास से जब चित्त शांत होता है, तब साधक आत्मा का प्रत्यक्ष अनुभव करके उसी में संतुष्ट होता है और इन्द्रियों से परे परम आनंद पाता है। गीता 5.18 और 6.29 में सच्चा ज्ञानी और योगी बाहरी भेदों से परे सभी प्राणियों में एक ही आत्मतत्त्व का दर्शन करता है, इसलिए जाति, पद या धन के भेद से ऊपर उठकर प्रत्येक के भीतर समान चेतना का सम्मान करें।