मैं लोकों का क्षय करने वाला प्रवृद्ध काल हूँ
भगवान स्वयं महाकाल हैं; जगत के उत्थान और विनाश का नियमन उन्हीं के हाथ में है, और परिणाम मनुष्य के अहंकारपूर्ण कर्तृत्व पर निर्भर नहीं।
जीवन में उपयोग: सब कुछ अपने नियंत्रण में मानने का अहंकार छोड़ें; कर्तव्य निभाएँ और परिणाम को बड़ी व्यवस्था पर छोड़ना सीखें।