द्वेष पर भगवद्गीता

51 श्लोक, अर्थ और जीवन में उपयोग सहित

"द्वेष" में सहायक भगवद्गीता के श्लोक 51 श्लोक, अर्थ, मूल शिक्षा और व्यावहारिक उपयोग सहित।

द्वेष किसी के प्रति भीतर पलती कड़वाहट है, जो प्रतिस्पर्धा, अपमान, पुराने घाव या ईर्ष्या से जन्म लेती है। यह सबसे पहले उसी को जलाती है जो इसे पालता है: नींद, रिश्ते और एकाग्रता सब पर असर पड़ता है। दूसरे को नीचा दिखाने की इच्छा अंततः हमारी अपनी शांति छीन लेती है।

गीता द्वेष का उपाय समदृष्टि में देखती है। गीता 6.29 में सच्चा योगी सब प्राणियों में एक ही आत्मतत्त्व देखता है, और गीता 6.32 में श्रेष्ठ योगी सबके सुख-दुःख को अपना मानता है। गीता 13.28 और 18.20 सब प्राणियों में एक अविनाशी तत्त्व को देखने वाले को ही सच्चा द्रष्टा और ज्ञानी कहती हैं। गीता 2.57 के अनुसार शुभ-अशुभ में न अति हर्ष, न द्वेष रखने वाले की प्रज्ञा स्थिर है।

गीता 6.32 के अभ्यास के लिए स्वयं से पूछें: यदि मैं सामने वाले की जगह होता, तो मुझसे कैसे व्यवहार की अपेक्षा होती? गीता 6.9 पक्षपात छोड़कर निष्पक्ष भाव की बात करती है, और गीता 9.29 कहती है कि भगवान् सबके प्रति सम हैं। जाति, पद या स्वभाव के भेद से ऊपर उठकर आदर का अभ्यास करें और शिकायत की जगह अपने प्रयास पर ध्यान दें।

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

गीता के अनुसार द्वेष को कैसे मिटाएँ?
सबमें समान चेतना को देखने के अभ्यास से। गीता 6.29 और 6.32 में श्रेष्ठ योगी सब प्राणियों को अपने समान और सबके सुख-दुःख को अपना मानता है। जब हम सामने वाले में अपना ही रूप देखने लगते हैं, तब कड़वाहट की जड़ कमज़ोर पड़ती है और व्यवहार में करुणा आती है।
गीता 6.32 में समदृष्टि का क्या अर्थ है?
गीता 6.32 के अनुसार श्रेष्ठ योगी वह है जो सभी प्राणियों को अपने समान देखता है और उनके सुख-दुःख को अपना ही सुख-दुःख मानता है। इसका अभ्यास यह प्रश्न पूछकर किया जा सकता है कि सामने वाले की स्थिति में मेरे साथ कैसा व्यवहार अपेक्षित होता।
गीता 2.57 के अनुसार स्थिर प्रज्ञा वाला शुभ-अशुभ को कैसे देखता है?
गीता 2.57 में जो व्यक्ति अनुकूल या प्रतिकूल परिस्थिति पाकर न अतिशय हर्ष करता है और न द्वेष, उसकी बुद्धि स्थिर मानी गई है। सफलता या आलोचना जैसे अवसरों पर अत्यधिक उत्साह या निराशा से बचकर संतुलित प्रतिक्रिया देना इसी की सीख है।
क्या सबमें एक ही आत्मा देखना व्यावहारिक है?
गीता 13.28 और 18.20 इसे सच्चे दर्शन और सात्त्विक ज्ञान की पहचान बताती हैं। व्यवहार में इसका अर्थ है लोगों के रूप, पद, जाति या स्वभाव से ऊपर उठकर उनके भीतर समान चेतना का सम्मान करना। इससे सामने वाले से मतभेद हो सकते हैं, पर उसके प्रति घृणा की गुंजाइश घट जाती है।
गीता 9.29 में भगवान् को सबके प्रति सम क्यों कहा गया है?
गीता 9.29 के अनुसार भगवान् किसी से राग-द्वेष नहीं रखते और सबके प्रति सम हैं, पर जो भक्ति से जुड़ते हैं, उन्हें उनकी उपस्थिति का विशेष अनुभव होता है, जैसे अग्नि के पास जाने वाले को ही उसकी गर्मी मिलती है। इसलिए शिकायत करने के बजाय स्वयं भक्ति और प्रयास से निकट आना चाहिए।

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