गीता का केंद्रीय संदेश कर्म को छोड़ना नहीं, कर्म को सही दृष्टि से करना है। जीवन में कोई भी क्षणभर कर्म के बिना नहीं रहता, इसलिए असली प्रश्न यह है कि हम किस भाव, किस प्रेरणा और किस अपेक्षा से कर्म करते हैं। जब काम केवल फल के लिए होता है, तब तनाव और असंतोष बढ़ता है, और जब वह कर्तव्य, समता और अर्पण से होता है, तब वही कर्म साधना बन जाता है।
गीता 2.47 कहती है कि अधिकार कर्तव्य-कर्म पर है, फल पर नहीं, इसलिए प्रयास और गुणवत्ता पर पूरा ध्यान दें और परिणाम को चिंता का बोझ न बनाएँ, पर निष्क्रियता से भी बचें। गीता 2.48 और 2.38 में आसक्ति त्यागकर सफलता-असफलता, सुख-दुःख और लाभ-हानि में सम रहना योग है, और गीता 2.50 में समबुद्धि के साथ किया गया कर्म कुशलता के साथ बंधन-मुक्त रखता है।
गीता 2.40 और 6.40 आश्वासन देती हैं कि सही दिशा में किया गया थोड़ा प्रयास भी व्यर्थ नहीं जाता, इसलिए छोटे-छोटे सही प्रयास निरंतर करते रहें। गीता 9.27 रोज़ के सब कर्मों को अर्पण-भाव से करने की सीख देती है, और गीता 4.16 कर्म, अकर्म और विकर्म का विवेक करने को कहती है, यानी कार्य का मूल्यांकन केवल बाहरी रूप से नहीं, उसके उद्देश्य, भावना और परिणामों के आधार पर करें।