गीता में ज्ञान केवल जानकारी का संग्रह नहीं, बल्कि वह समझ है जो संशय काटती है, मोह मिटाती है और कर्म को दिशा देती है। जीवन में सबसे बड़ी बाधाएँ अक्सर जानकारी की कमी से नहीं, भ्रम, संदेह और अहंकार से आती हैं। इसलिए गीता ज्ञान को श्रद्धा, विनम्रता, संयम और कर्म, चारों के साथ जोड़कर देखती है, ताकि वह जीवन में उतर सके।
गीता 4.42 कहती है कि ज्ञानरूपी तलवार से संशय को काटकर कर्तव्य और साधना के मार्ग पर दृढ़ता से खड़े हों, और गीता 4.40 के अनुसार अज्ञान, श्रद्धा का अभाव और निरंतर संशय प्रगति और शांति के सबसे बड़े अवरोध हैं। गीता 4.39 में श्रद्धा, तत्परता और इन्द्रियसंयम से ज्ञान मिलता है और ज्ञान अंततः परम शांति देता है, और गीता 4.34 योग्य गुरु से विनम्रता, सेवा और जिज्ञासापूर्ण प्रश्नों द्वारा ज्ञान पाने की विधि बताती है।
गीता 4.18 में सच्चा ज्ञानी कर्म के वास्तविक तत्त्व को समझता है और कर्म करते हुए भी बंधन से मुक्त रहता है, इसलिए किसी का मूल्यांकन केवल गतिविधियों से नहीं, उसकी चेतना और उद्देश्य से करें। गीता 4.38 ज्ञान को सबसे बड़ा शुद्धिकारक कहती है, गीता 4.35 में ज्ञान से मोह मिटकर सब प्राणियों में एकत्व का दर्शन होता है, और गीता 4.24 में ज्ञान की पराकाष्ठा सबमें एक ही परम सत्य का अनुभव है।