त्याग का अर्थ अक्सर सब कुछ छोड़कर चले जाना समझा जाता है, पर गीता इस धारणा को सुधारती है। सच्चा त्याग वस्तुओं या काम का नहीं, उनके प्रति आसक्ति और अहंकार का होता है। जो कर्तव्य से भागकर स्वयं को त्यागी मान लेता है, वह वास्तव में भ्रम में है, और जो भीतर से मुक्त रहकर कर्तव्य निभाता है, वह वास्तविक त्यागी है।
गीता 18.4 बताती है कि त्याग का वास्तविक स्वरूप समझने के लिए उसके तीन भेद जानना ज़रूरी है, और उसका मूल्य बाहरी रूप में नहीं, भाव में है। गीता 18.7 के अनुसार मोह से नियत कर्म का त्याग तामसिक है, और गीता 18.8 में कष्ट के भय से कर्तव्य छोड़ना राजसिक त्याग है, जिसका फल नहीं मिलता। इसलिए कठिनाई के कारण कर्तव्य से बचने की प्रवृत्ति को धैर्य और दृढ़ता से पहचानें।
गीता 18.10 में सात्त्विक त्यागी न अप्रिय कर्म से द्वेष करता है, न सुखद कर्म में आसक्त होता है, यानी पसंद-नापसंद से ऊपर उठकर कर्तव्य के अनुसार कार्य करता है। गीता 12.17 में जो न हर्षित होता है, न द्वेष, शोक या कामना करता है, वह भक्त प्रिय है, और गीता 15.3 असंगता के शस्त्र से आसक्ति की जड़ काटने की सीख देती है। गीता 3.12 अर्पण और कृतज्ञता के बिना केवल भोग को अनुचित बताती है, और गीता 1.46 में कर्तव्य से पलायन विषाद की अवस्था है, समाधान नहीं।