स्थिर ध्यान वह लौ है जो काँपती नहीं।
विद्यार्थी जीवन पर भगवद्गीता के उद्धरण
133 उद्धरण – पढ़ें, मनन करें और साझा करें
भगवद्गीता से लिए गए उद्धरण 133 उद्धरण, हर एक अपने श्लोक से जुड़ा।
विद्यार्थी जीवन के लिए भगवद्गीता के उद्धरण देखें, जो एकाग्रता, अनुशासन, परीक्षा के दबाव और परिणाम के भय को छोड़कर निष्ठा से सीखने की बात करते हैं।
सभी 133 उद्धरण
पूर्णता नहीं, कुशलता का अभ्यास करो।
अपनी बिखरी ऊर्जा को एक स्थिर लौ में समेट लो।
लौ जितनी स्थिर, प्रकाश उतना स्पष्ट।
तुम्हारा ध्यान जितनी बार जाए, उतनी बार उसे घर ले आओ।
मन को कर्म से जोड़ो, फिर कर्म को जाने दो।
पूरा जानने के लिए पूरा ध्यान दो।
विद्यार्थी का सबसे अच्छा औज़ार एक सटीक प्रश्न है।
हर सूचना तुम्हारे ध्यान की हक़दार नहीं।
अपने विचलनों को ध्यान की अग्नि में अर्पित करो।
एकाग्र ध्यान एक शांत शक्ति है।
शोर से हटना ही एकाग्रता की शुरुआत है।
एकाग्रता सही द्वार बंद करने की कला है।
सबसे अच्छे विद्यार्थी तुलना से मुक्त होते हैं।
विद्यार्थी वह है जो दिशा माँगने का साहस रखता है।
अच्छा शिष्य विनम्र, जिज्ञासु और उपयोगी होता है।
एक स्थान पर समेटा हुआ ध्यान शक्ति बन जाता है।
हर लाभ का हिसाब रखते-रखते सामने का काम छूट जाता है।
सूचना सिर भरती है; स्थिरता उसे ठहराती है।
भक्ति सीख को ऊष्मा देती है; अनुशासन उसे टिकाऊ बनाता है।
एकाग्रता एक निर्णय है, जो रोज़ दोहराया जाता है।
भक्ति से किया गया अध्ययन भी अर्पण है।
सिर हिलाकर मत चलो; तब तक पूछो जब तक बात समझ न आए।
सीखते रहो, तो तुम्हारा श्रम कभी व्यर्थ नहीं जाता।
स्थिर मन ज्ञान को गहराई से पीता है।
एक चीज़ पर तब तक ध्यान रखो जब तक वह मित्र न बन जाए।
स्थिर मन को काम अधिक स्पष्ट दिखाई देता है।
ध्यान को वापस खींचना किसी भी अन्य कला जैसी एक कुशलता है।
विक्षेप दृढ़ है; इसलिए ध्यान को भी दृढ़ होना होगा।
ध्यान के पाल सोच-समझकर चढ़ाओ।
अपनी सर्वोत्तम सीखों को लौटकर दोहराओ, इससे पहले कि वे चुपचाप छूट जाएँ।
भटकना स्वाभाविक है; लौट आना ही साधना है।
मन को स्थिर न रख पाएँ तो उसे बार-बार वापस लाने का अभ्यास कीजिए।
फल छोड़िए, कर्म नहीं।
झुको, पूछो और सेवा करो: ज्ञान के तीन द्वार।
कर्म जारी रखिए; पुरस्कार छोड़ दीजिए।
फल छोड़ दो, तो काम हल्का हो जाता है।
फल छोड़ो, काम नहीं।
बेचैन मन असफल नहीं, केवल अप्रशिक्षित होता है।
अंकतालिका को अपने भीतर का मौसम तय मत करने दो।
सीखने को सदा और होगा, और यह एक आनंद है।
अपना हिस्सा पूरा कीजिए; फसल खेत पर छोड़ दीजिए।
काम करो, चाह को जाने दो।
हर कार्य को कुछ सिखाने दो।
सीखना विनम्रता से शुरू होता है और प्रश्नों से बढ़ता है।
बिना पकड़ के स्थिर प्रयास स्थायी शांति लाता है।
टिकाऊ प्रयास वीरतापूर्ण उफान से बेहतर है।
अपने ध्यान को विचलन की हवाओं से बचाओ।
विचलन के द्वार एक-एक करके बंद करो।
विवेक की भूख एक अच्छी भूख है।
जो विद्यार्थी कभी तृप्त नहीं होता, वह सीखता रहता है।
स्वयं को धोखा मत दो; शॉर्टकट पथ से अधिक महँगा पड़ता है।
काम कठिन हो तब भी उसमें बने रहो।
जो कार्य सामने है, उसे ऐसे कीजिए मानो वह ईश्वर के लिए हो।
हर अध्ययन से पूछो: यह मुझे कहाँ ले जा रहा है?
अनुशासन आरंभ में विष और अंत में अमृत है।
ईमानदार प्रश्न ही समझ की पहली सीढ़ी हैं।
दृष्टि स्थिर रखो, विचार पीछे आएँगे।
स्थिर, सही दिशा का प्रयास जंगली उत्साह से आगे पहुँचता है।
बहुत कुछ हल्के से जानने से अच्छा है थोड़ा गहराई से जानना।
शिक्षा को वैसे लो जैसे उपहार लेते हो: कृतज्ञता से।
अध्ययन भी उपासना का एक रूप है।
दोहराया हुआ विवेक एक बार सुनने से गहरा उतरता है।
ऐसे श्रोता बनो जिसे पढ़ाना सार्थक हो।
वही शिक्षा फिर माँगने में कभी संकोच मत करो।
पहले सुनो, फिर देखो: गहरे सीखने का यही क्रम है।
कुशलता वही है जब शांत ध्यान सामने के कार्य में लग जाए।
जब भी हो सके, शोर के बजाय एकाग्रता चुनो।
दोहराव ऊब नहीं; यही गहरी बातों के उतरने का तरीका है।
परिणामों की चिंता प्रयास को ग़लत जगह ख़र्च कर देती है।
जिस हाथ को परिणाम काँपाते हैं, विवेक उसे स्थिर करता है।
भटके मन को बिना डाँटे लौटा लाओ।
पूरे मन से काम करो, और परिणाम को अर्पित कर दो।
हर कार्य मन को माँजने का अवसर है।
प्रयास के प्रति समर्पित रहो और निर्णय के प्रति उदासीन।
समझने तक पूछते रहो।
बीते कल की गति आज के लिए उपहार है।
प्रयास को उतना समय दो जितना उसे चाहिए।
फिर से सुनो; सर्वोत्तम शिक्षाएँ दोहराने योग्य हैं।
अपने शिक्षकों को आमंत्रित करो कि वे तुम्हें देखना सिखाएँ।
और माँगो; सच्ची शिक्षा पोषित करती है, भरती नहीं।
शिक्षक को तय करने दो कि तुम कब तैयार हो, और उन पर भरोसा रखो।
अच्छा विद्यार्थी उत्तर खोजने से पहले प्रश्नों की सूची बनाता है।
व्यापक पढ़ो; सत्य के अनेक कथावाचक हैं।
ईमानदारी की आदतें जल्दी बनाने योग्य हैं।
भय अक्सर कार्य से पहले गुरु के पास चलकर जाता है।
संकल्पित मन एक दिशा में जाता है; अनिर्णीत मन हर दिशा में।
बहता हुआ मन हर झोंके के पीछे चल पड़ता है।
अपने कर्मों का अध्ययन ऐसे करो जैसे विद्यार्थी किसी विषय का करता है।
परिणाम से कम अपेक्षा रखो; कार्य को अधिक दो।
श्रद्धा से पूछो, उत्तर गहरे हो जाते हैं।
शिक्षक केवल खुले पात्र में ही उँडेल सकते हैं।
सफलता उन्हें मिलती है जो सही साधनों से प्रयास करते हैं।
अनंत विषय सीखने का अर्थ है कहीं से शुरू करना।
जब लक्ष्य अर्पण हो, तब असफलता का दंश कम हो जाता है।
बहुत-सी शिक्षाएँ उसी मन को बिखेर सकती हैं जिसे वे स्थिर करने आई थीं।
हर बार जब तुम्हें अपने भटकने का भान होता है, वही प्रगति है।
एकाग्र हृदय वहाँ पहुँचता है जहाँ बिखरे हृदय भटकते हैं।
अच्छी आदतें अच्छी तैयारी से शुरू होती हैं।
ध्यान वहीं ठहरे जहाँ दृष्टि ठहरे।
स्पष्टता धैर्यपूर्ण ध्यान का उपहार है।
टालमटोल स्वयं का धीमा क्षरण है।
काम ऐसे करो मानो परिणाम पहले ही स्वीकार हो चुका हो।
श्रेष्ठ होना भीतर की शांति को बाहर के प्रयास से जोड़ना है।
फल जहाँ गिरे गिरे; तुम चलते रहो।
स्थिर दिनचर्या एक कोमल शिक्षक है।
अपने प्रयास को स्वच्छ और उज्ज्वल जलने दो।
अच्छे प्रश्न उत्तर खोजने से पहले शब्दों को नाम देते हैं।
आज का ध्यान कल के झुकाव को गढ़ता है।
भारी प्रयास अच्छा प्रयास नहीं होता।
भोग के प्रति आसक्ति वह एकाग्रता छीन लेती है जो विवेक को चाहिए।
कई आवाज़ें खींचती हैं; स्थिर मन टिका रहता है।
समर्पण प्रदर्शन-चिंता की औषधि है।
संशय अध्ययन और स्थिर अभ्यास से घिसकर दूर होता है।
शरीर, मन और बुद्धि को आसक्ति के बिना काम में लगाओ।
स्वच्छ मन कार्य को स्पष्ट देखता है।
काम से अधिक पुरस्कार को चाहने पर काम को कष्ट होता है।
जो आपके हिस्से का कार्य है, उसमें डूब जाइए।
गुरु उन्हीं प्रश्नों के लिए हैं जिन्हें पूछने का साहस हम जुटा पाते हैं।
आज काम करो ताकि कल विश्राम के योग्य बनो।
भूलना भी इस व्यवस्था में अपना स्थान रखता है।
सुखद और अप्रिय, दोनों कार्यों में स्थिर।
साधन को धार दीजिए, कार्य को स्पष्ट कीजिए, कर्ता को स्थिर कीजिए।
उत्साह को काम से आने दीजिए, उसके पुरस्कार से नहीं।
अपनी तैयारी पर भरोसा कीजिए, अपनी गणना पर नहीं।
ध्यान से देखा गया कार्य बेहतर समझा जाता है।
सर्वोत्तम अनुशासन सहज अच्छे काम जैसा दिखता है।
अभ्यास रुकते ही विस्मृति शुरू हो जाती है।
आज के काम ने तुम्हें क्या सिखाया?
अध्याय का अंत अभ्यास के एक शांत संकल्प के साथ कीजिए।
भ्रम में अधूरा छोड़ा गया कार्य स्वयं को अधूरा छोड़ना है।
उलझन को जब गुरु के पास ले जाओ, वह सीख बन जाती है।
प्रेम जब ध्यान से जुड़ता है, सीख गहरी हो जाती है।
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