गीता में भक्ति केवल पूजा-पाठ नहीं, बल्कि पूरे जीवन को ईश्वर से जोड़ने वाली दृष्टि है: प्रेम, विश्वास, समर्पण और कर्म का मेल। जो लोग केवल ज्ञान या केवल कर्म को ही श्रेष्ठ मानते हैं, उन्हें गीता बताती है कि प्रेममयी भक्ति योग की चरम पूर्णता है, और जो लोग भक्ति को केवल भावना समझते हैं, उन्हें बताती है कि भक्त के गुण व्यवहार में दिखते हैं। यह मार्ग हर व्यक्ति के लिए सुलभ है।
गीता 6.47 कहती है कि सभी योगियों में वह सर्वोत्तम है जो श्रद्धा से अपना अन्तःकरण भगवान् में लगाकर प्रेमपूर्वक उनका भजन करता है, और गीता 18.66 पूर्ण शरणागति की बात करती है, जो कर्तव्य के त्याग का उपदेश नहीं, बल्कि कर्तव्य करते हुए भी भगवान् पर निर्भरता का सार है। गीता 9.22 में अनन्य भक्तों के योगक्षेम का भगवान् स्वयं वहन करते हैं, इसलिए कर्तव्य निष्ठा से करते हुए परिणाम और सुरक्षा की चिंता उन पर छोड़ें।
गीता 9.34 और 18.65 चार सरल साधन बताती हैं: मन भगवान् में लगाओ, भक्त बनो, पूजन करो और नमन करो। गीता 6.30 और 6.31 में जो सबमें भगवान् को और सबको भगवान् में देखता है, वह उनसे कभी अलग नहीं होता, और गीता 11.55 में जो भगवान् के लिए कर्म करता है, आसक्ति छोड़ता है और किसी से वैर नहीं रखता, वही उन्हें प्राप्त करता है। इसलिए भक्ति को अपने कर्म, संबंध और स्मरण, तीनों में उतारें।