चंचलता पर भगवद्गीता

86 श्लोक, अर्थ और जीवन में उपयोग सहित

"चंचलता" में सहायक भगवद्गीता के श्लोक 86 श्लोक, अर्थ, मूल शिक्षा और व्यावहारिक उपयोग सहित।

चंचलता का अर्थ है मन का किसी एक विषय पर टिक न पाना। पढ़ते समय फ़ोन की ओर, काम करते समय पुरानी बातों की ओर और ध्यान के समय योजनाओं की ओर मन भागता रहता है। इससे काम अधूरे रहते हैं, समय बिखरता है और व्यक्ति अक्सर स्वयं से निराश हो जाता है।

अर्जुन ने भी यही अनुभव कहा था। गीता 6.34 में वे मन को चंचल, प्रबल और हठी बताते हैं। इसका उत्तर गीता 6.35 में मिलता है: मन निस्संदेह चंचल है, पर अभ्यास और वैराग्य से उसे वश में किया जा सकता है। गीता 6.26 का भाव है कि मन जहाँ-जहाँ भटके, साधक उसे बार-बार संयमपूर्वक आत्मा में स्थिर करे।

गीता 6.19 स्थिर चित्त की तुलना हवा-रहित स्थान में जलते दीपक की लौ से करती है। मन भटके तो स्वयं को दोष न दें, बिना झुँझलाए उसे वापस लाएँ। गीता 6.6 के अनुसार संयमित मन सहायक बनता है। रोज़ एक निश्चित समय पर ध्यान, एक समय में एक काम पर पूरा ध्यान और अनावश्यक आसक्तियों से दूरी, ये छोटे नियम धीरे-धीरे असर दिखाते हैं।

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सभी 86 श्लोक

4.29

ध्यान साधना

प्राणायाम रूप यज्ञ

नियंत्रित श्वास आंतरिक संतुलन और एकाग्रता का द्वार है।

8.10

मृत्यु और पुनर्जन्म

अंत समय में भक्ति और योगबल से भ्रूमध्य में प्राण स्थापित कर परम पुरुष की प्राप्ति

भक्ति और योगबल से स्थिर मन अंतिम क्षण में भी परम पुरुष तक पहुँचा देता है।

गीता में कहाँ

संबंधित विषय

जीवन-क्षेत्र

विषय

गुण

आधुनिक संदर्भ

चुनौतियाँ

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

गीता के अनुसार चंचल मन को वश में कैसे करें?
अभ्यास और वैराग्य से। गीता 6.35 में कहा गया है कि चंचल और कठिनता से वश में होने वाला मन भी नियमित अभ्यास तथा अनावश्यक आसक्तियों से दूरी द्वारा नियंत्रित हो सकता है। केवल इच्छाशक्ति काफ़ी नहीं होती, धैर्य के साथ लंबे समय तक किया गया अभ्यास चाहिए।
गीता 6.35 में अभ्यास और वैराग्य का क्या अर्थ है?
अभ्यास का अर्थ है ध्यान और आत्मसंयम का निरंतर प्रयास, और वैराग्य का अर्थ है उन आसक्तियों से दूरी जो मन को बार-बार खींचती हैं। दोनों साथ चलें तो मन का भटकना घटता है। गीता 6.35 इन्हीं दो साधनों को मन पर विजय का रास्ता बताती है।
गीता 6.26 के अनुसार ध्यान में मन भटके तो क्या करें?
गीता 6.26 कहती है कि मन का भटकना स्वाभाविक है, पर साधक को हर बार उसे शांति से वापस आत्मा में स्थापित करना चाहिए। यानी भटकने पर झुँझलाने या स्वयं को कोसने के बजाय धैर्य से मन को फिर अपने उद्देश्य पर लौटा लाना ही ध्यान का सतत अभ्यास है।
क्या मन का चंचल होना कोई दोष है?
गीता इसे दोष नहीं, मन का स्वभाव मानती है। गीता 6.34 में अर्जुन स्वयं मन को चंचल और हठी कहते हैं, और गीता 6.35 उसका उपाय बताती है। इसलिए चंचलता देखकर निराश होने के बजाय यह समझें कि मन का प्रशिक्षण एक लंबी प्रक्रिया है।
गीता 6.19 में दीपक की उपमा क्या सिखाती है?
गीता 6.19 में योग से संयमित चित्त की स्थिरता को हवा-रहित स्थान में जलते दीपक की लौ जैसा बताया गया है। जैसे वहाँ लौ नहीं काँपती, वैसे अभ्यासी का मन बाहरी विक्षेपों से विचलित नहीं होता। यह उपमा बताती है कि स्थिरता के लिए विकर्षणों से बचाव और नियमित साधना दोनों उपयोगी हैं।

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