ब्रह्म पर भगवद्गीता

60 श्लोक, अर्थ और जीवन में उपयोग सहित

ब्रह्म पर भगवद्गीता के श्लोक 60 श्लोक, अर्थ और उपयोग सहित।

ब्रह्म शब्द उस परम, अपरिवर्तनशील सत्य की ओर संकेत करता है जो नाम-रूप से परे है और सबके भीतर और पीछे विद्यमान है। यह दर्शन केवल पुस्तकों तक सीमित नहीं है: जब हम भेदभाव, तुलना और अलगाव में उलझते हैं, तब ब्रह्म-दृष्टि हमें एकता, संतुलन और भीतर की शांति की ओर लौटाती है। इसे समझना कठिन लग सकता है, इसलिए गीता इसे अनुभव और अभ्यास के स्तर पर समझाती है।

गीता 4.24 में ब्रह्मदृष्टि प्राप्त साधक सम्पूर्ण जगत और समस्त कर्मों में एक ही परम सत्य का अनुभव करता है और ब्रह्म को प्राप्त होता है। गीता 2.16 नित्य और अनित्य का भेद बताती है, और गीता 2.72 में ब्राह्मी स्थिति वह है जिसे पाकर साधक मोह से मुक्त होता है। गीता 5.20 कहती है कि स्थिर बुद्धि वाला, जो प्रिय-अप्रिय में विचलित नहीं होता, ब्रह्म में स्थित रहता है।

गीता 5.19 के अनुसार जिसका मन समभाव में स्थित हो जाता है, वह ब्रह्म के समान दोषरहित दृष्टि पाकर संसार के बंधनों पर विजय पा लेता है, और गीता 5.17 में जिसकी बुद्धि, मन और निष्ठा ब्रह्म में स्थित है, वह ज्ञान से पापों से मुक्त होकर पुनर्जन्म से परे जाता है। गीता 5.24 और 6.28 बताती हैं कि भीतर से सुख पाने वाला और नियमित योगाभ्यास करने वाला परम शांति तथा अनंत सुख अनुभव करता है।

इन श्लोकों से शुरू करें

सभी 60 श्लोक

गीता में कहाँ

संबंधित विषय

जीवन-क्षेत्र

चुनौतियाँ

गुण

आधुनिक संदर्भ

विषय

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

गीता में ब्रह्म का क्या अर्थ है?
गीता में ब्रह्म वह परम सत्य है जो नित्य है और सबमें व्याप्त है। गीता 4.24 में ब्रह्मदृष्टि वाला साधक सम्पूर्ण जगत और सब कर्मों में एक ही परम सत्य का अनुभव करता है, और गीता 2.16 में जो बदलता है वह असत् है, जो सदा रहता है वही सत् है। यह दृष्टि भेदभाव घटाकर एकता और सम्मान देती है।
गीता 5.19 में समभाव और ब्रह्म के समान दृष्टि का क्या संबंध है?
गीता 5.19 के अनुसार जिसका मन समभाव में स्थित हो जाता है, वह ब्रह्म के समान दोषरहित दृष्टि पाकर संसार के बंधनों पर विजय पा लेता है। इसलिए सफलता-असफलता, लाभ-हानि और सम्मान-अपमान में संतुलित दृष्टि बनाए रखने का अभ्यास करें; यही समभाव ब्रह्म-दृष्टि की ओर ले जाता है।
गीता 5.17 के अनुसार ब्रह्म में स्थित बुद्धि का क्या फल है?
गीता 5.17 कहती है कि जिसकी बुद्धि, मन और निष्ठा परम ब्रह्म में स्थित हो जाती है, वह ज्ञान द्वारा पापों से मुक्त होकर पुनर्जन्म से परे चला जाता है। इसलिए अपने जीवन के लक्ष्य को केवल भौतिक उपलब्धियों तक सीमित न रखकर उच्च आध्यात्मिक उद्देश्य से जोड़ें।
ब्रह्म-दृष्टि को रोज़ के जीवन में कैसे उतारें?
गीता 4.24 की सीख है कि भेदभाव और अलगाव की भावना को कम करके सभी में एकता, सम्मान और दिव्यता को देखने का अभ्यास करें। अपने कामों और लोगों के प्रति इसी दृष्टि से व्यवहार करें, और गीता 5.19 की तरह सफलता-असफलता में संतुलित दृष्टि बनाए रखने का अभ्यास करें।
ब्रह्म में स्थित व्यक्ति कठिन परिस्थिति में कैसा व्यवहार करता है?
गीता 5.20 के अनुसार जिसकी बुद्धि स्थिर है और जो प्रिय-अप्रिय परिस्थितियों से विचलित नहीं होता, वह ब्रह्म में स्थित रहता है। इसलिए कठिन परिस्थिति में वह बाहरी घटनाओं को अपनी मानसिक अवस्था नियंत्रित नहीं करने देता और संतुलित प्रतिक्रिया देता है। यह स्थिरता अभ्यास से विकसित की जा सकती है।

एक्सप्लोरर में फ़िल्टर करें

भगवद्गीता खोजें

← विषय