निर्णय लेना जीवन की रोज़ की ज़रूरत है, पर कुछ निर्णय, जैसे करियर, विवाह, पैसा या किसी रिश्ते का भविष्य, बहुत भारी लगते हैं। इनमें भावनाएँ, दबाव, लोगों की राय और भविष्य की आशंका सब मिल जाते हैं। जल्दबाज़ी में लिया निर्णय पछतावा देता है और अत्यधिक टालना अवसर छीन लेता है, इसलिए एक संतुलित तरीका चाहिए।
गीता 18.30 सात्त्विक बुद्धि की पहचान बताती है: वह कर्तव्य-अकर्तव्य, भय-अभय और बंधन-मुक्ति का स्पष्ट भेद कर पाती है। गीता 16.23 कहती है कि केवल कामना और मनमानी से चलने वाले को सिद्धि और सुख नहीं मिलते, और गीता 16.24 क्या करें, क्या न करें के निर्णय में शास्त्र को आधार बनाने को कहती है। इसलिए बड़े निर्णयों से पहले धर्म, शास्त्र और अनुभवी जनों से मार्गदर्शन लें।
गीता 11.34 बताती है कि बड़े नामों, संबंधों और परिणामों का भय और मोह कर्तव्य के मार्ग में बाधा हैं, इसलिए निर्णय का आधार भय नहीं, विवेक और धर्म होना चाहिए। गीता 4.42 संशय को ज्ञान से काटकर साहस से कदम उठाने की सीख देती है, और गीता 18.63 पूरी तरह विचार करके अपनी इच्छा से निर्णय लेने की स्वतंत्रता देती है।