मानव स्वभाव को समझना जीवन के हर क्षेत्र में काम आता है: हम क्यों भटकते हैं, क्यों गुस्सा आता है, क्यों अधिक की चाह रुकती नहीं और क्यों हम जानते हुए भी वही गलतियाँ दोहराते हैं। गीता इन प्रश्नों को निर्मम आलोचना से नहीं, स्वीकृति और अभ्यास से देखती है: मन चंचल है, पर प्रशिक्षित हो सकता है, और स्वभाव शक्तिशाली है, पर विवेक से दिशा पा सकता है।
गीता 6.34 में अर्जुन कहते हैं कि मन स्वभाव से चंचल, प्रबल और हठी है, और गीता 6.5 तथा 6.6 के अनुसार वही मन उत्थान का सबसे बड़ा सहारा भी है और पतन का कारण भी, इसलिए परिस्थितियों को दोष देने के बजाय अपने विचारों, आदतों और मन के प्रशिक्षण पर ध्यान दें। गीता 16.21 काम, क्रोध और लोभ को पतन के तीन द्वार बताती है, जिन्हें पहचानकर उन पर नियंत्रण का सतत अभ्यास करना चाहिए।
गीता 2.62 और 2.63 बताती हैं कि पतन की प्रक्रिया विषय-चिंतन से शुरू होती है: चिंतन से आसक्ति, आसक्ति से कामना, अपूर्ण कामना से क्रोध, और क्रोध विवेक को ढककर पतन तक ले जाता है। गीता 2.14 कहती है कि सुख-दुःख इन्द्रिय-संयोग से उत्पन्न होकर अनित्य हैं, इसलिए उन्हें धैर्य से सहें, और गीता 2.55 में कामनाएँ छोड़कर आत्मा में संतुष्ट रहना स्थिर बुद्धि का लक्षण है।