ब्रह्मांडीय व्यवस्था का अर्थ है कि सृष्टि अराजक नहीं, किसी नियम और परस्पर निर्भरता से चलती है: सूर्य-चंद्र, ऋतुएँ, जन्म-मृत्यु और कर्म-फल का क्रम। जब हम इसे समझते हैं, तो अपने सुख-दुख को पूरे चक्र के संदर्भ में देख पाते हैं, और 'सब कुछ मेरे नियंत्रण में है' का भ्रम घटता है। इससे विनम्रता और कृतज्ञता बढ़ती है।
गीता 3.16 कहती है कि जो व्यक्ति कर्तव्य-चक्र में योगदान न देकर केवल इन्द्रिय-भोग में लगा रहता है, वह जीवन के वास्तविक उद्देश्य से चूक जाता है, इसलिए परिवार, समाज और कार्य के प्रति जिम्मेदारी निभाएँ। गीता 3.10 और 3.11 सृष्टि को त्याग और परस्पर पोषण के आधार पर चलता बताती हैं। गीता 15.1 में संसार को ऐसे वृक्ष की तरह बताया गया है जिसका मूल परमात्मा में है।
गीता 14.3 में मूल प्रकृति परमेश्वर की योनि है, जिसमें वे चेतन-बीज स्थापित करते हैं, इसलिए सृष्टि को केवल जड़ पदार्थों का खेल न मानें। गीता 8.16 बताती है कि ऊँचे से ऊँचे लोक भी अस्थायी हैं, जबकि भगवान् की प्राप्ति स्थायी है, और गीता 2.28 कहती है कि प्राणियों का आदि-अंत अव्यक्त है, केवल बीच की अवस्था प्रकट है। गीता 18.14 कर्म की सिद्धि के पाँच कारण बताकर कर्ता के अहंकार को घटाती है।