आत्मसंयम एक ऐसा गुण है जो जन्मजात नहीं, बल्कि छोटे-छोटे नियमित चुनावों से बनता है: इच्छा और कर्म के बीच विराम बना पाना, आवेग में तुरंत प्रतिक्रिया न देना और दीर्घकालिक लाभ के लिए तात्कालिक सुख को टाल पाना। जब यह गुण कमज़ोर होता है, तब खान-पान, समय, खर्च और वाणी, सब बिखरने लगते हैं। गीता आत्मसंयम को मन के प्रशिक्षण और सजग निगरानी की साधना के रूप में सिखाती है।
गीता 6.5 और 6.6 के अनुसार मन उत्थान का सबसे बड़ा सहारा भी है और पतन का कारण भी, इसलिए परिस्थितियों को दोष देने के बजाय नियमित आत्मनिरीक्षण, अनुशासन और साधना से मन को अपना मित्र बनाएँ। गीता 6.36 कहती है कि प्रतिभा से अधिक आत्मसंयम, नियमित अभ्यास और निरंतर प्रयास किसी भी महान लक्ष्य की कुंजी हैं, और गीता 2.58 की कछुए की उपमा आवश्यकता पड़ने पर ध्यान को समेट लेने का अभ्यास सिखाती है।
गीता 2.62 बताती है कि पतन की प्रक्रिया विषय-चिंतन से शुरू होती है, इसलिए किसी भी आकर्षण या लगाव के प्रारंभिक चिंतन पर ही सजग रहें। गीता 5.23 में काम-क्रोध के आवेग को सहने वाला स्थायी सुख का अधिकारी बनता है, गीता 5.22 क्षणिक सुख के आकर्षण में दीर्घकालिक कल्याण का त्याग न करने को कहती है, और गीता 16.21 काम, क्रोध और लोभ को पतन के तीन द्वार बताती है, जिन्हें पहचानकर उन पर नियंत्रण का अभ्यास करना चाहिए।