लालसा चिपकाने वाला गोंद है; उसे हटाओ तो कर्म फिसल जाता है।
इच्छा पर भगवद्गीता के उद्धरण
465 उद्धरण – पढ़ें, मनन करें और साझा करें
भगवद्गीता से लिए गए उद्धरण 465 उद्धरण, हर एक अपने श्लोक से जुड़ा।
कामना पर भगवद्गीता के उद्धरण देखें और समझें कि गीता तृष्णा को एक बेचैन करने वाली शक्ति कैसे बताती है और विवेक से उसे वश में करना कैसे सिखाती है।
सभी 465 उद्धरण
दमन बर्तन पर ढक्कन है; समझ आँच धीमी करना है।
सागर बनो: हर कामना को आने दो, पर कोई तुम्हें उफनने न दे।
हर योजना से पूछो: यह किसकी चाह है?
कम चाहत, अधिक स्पष्टता।
धर्म से निर्देशित इच्छा स्वस्थ इच्छा है।
त्याग हाथ को रोकता है; लालसा को केवल गहरी दृष्टि शांत करती है।
योजना अच्छी बनाओ, पर कलम इच्छा के हाथ में मत दो।
'मेरा क्या लाभ' को छोड़ो, मन शांत होता दिखेगा।
जब मन स्वयं में विश्राम करता है, चाहत की पकड़ ढीली पड़ती है।
देखो कि कौन-सी चाहतें असली हैं और कौन-सी प्रतिध्वनियाँ।
अपनी इच्छाओं को उस ओर लक्षित करो जो सबके लिए अच्छा है।
पसंद और नापसंद शुरुआत से ही हमारी दृष्टि को धुँधला करते हैं।
इच्छा और द्वेष एक ही भ्रम के दो पहलू हैं।
सुख का पीछा तुम्हें आते-जाते रखता है।
हर चमकती चीज़ का पीछा करना सुरक्षित नहीं।
जब इच्छा तुम्हें चकाचौंध की ओर खींचे, रुको।
तुम अपनी इच्छाओं के साक्षी हो, उनके सेवक नहीं।
उस व्यस्तता से सावधान रहो जो और अधिक चाहने पर पलती है।
'और अधिक' और 'और तेज़' के खिंचाव को पहचानो।
लालसा संकेत है, आदेश नहीं।
लोभ छोड़ो और तुम्हें पर्याप्त मिल जाता है।
जीवन को केवल भूख तक सीमित मत करो।
धन अच्छा सेवक है, पर कठोर स्वामी।
एक बार में एक रस्सी ढीली करो।
देखो कि आनंद कब विवशता में बदल जाता है।
लालसा, क्रोध और लोभ आत्म-हानि के तीन द्वार हैं; उन्हें बंद करना सीखो।
हर इच्छा को अपनी योजनाएँ मत लिखने दो।
कामना का एक तेज़ झोंका अनुशासन की लंबी यात्रा को उलट सकता है।
इच्छा और क्रोध एक ही बेचैनी के दो चेहरे हैं।
घृणा और लालसा दोनों छोड़ दो, तो त्याग पर्याप्त हो गया।
परिणाम की कामना ही वह गाँठ है जो बाँधती है।
इच्छा के पहले वेग पर कर्म मत करो।
योग वहाँ से शुरू होता है जहाँ स्वार्थी योजनाएँ समाप्त होती हैं।
मौन में बैठने से पहले चाहतों की भीड़ हटा दो।
अनेक इच्छाएँ केवल हमारे अपने विचारों द्वारा बोई जाती हैं।
जब आवेग शांत होता है, आनंद ठहरे जल की तरह ऊपर आता है।
अपनी इच्छाओं को अपने मूल्यों के साथ कदम मिलाकर चलने दो।
वे चीज़ें चाहो जो तुम्हें बेहतर बनाएँ, छोटा नहीं।
इच्छा हमारा ध्यान उससे चुरा सकती है जो सबसे अधिक मायने रखता है।
हम अक्सर वह खोजते हैं जो हमारी प्रकृति चाहती है, वह नहीं जो हृदय को चाहिए।
जब इच्छा की पकड़ ढीली होती है, विवेक लौट आता है।
हर पूरी हुई इच्छा के पीछे हमसे बड़ा कुछ होता है।
सीमित इच्छाएँ सीमित सुख लाती हैं।
पसंद-नापसंद पहला आवरण है।
कम 'ज़रूर चाहिए' और 'बिल्कुल नहीं चाहिए' के साथ संसार से मिलो।
परम की इच्छा पूरे जीवन को सरल बना सकती है।
स्वर्ग सुंदर इच्छा है, पर अंतिम घर नहीं।
इच्छा, द्वेष, सुख और दुःख क्षेत्र का भाग हैं, जानने वाले का नहीं।
इंद्रियों का आनंद लो, उनके स्वामित्व में आए बिना।
किसी खास प्रकार की भावना की ज़रूरत छोड़ दो।
बेचैन प्रेरणा लालसा से जन्मती है।
बेचैनी इस बात का संकेत है कि प्रेरणा ने शांति पर बढ़त ले ली है।
लालसा के नीचे पूछो कि तुम वास्तव में किसकी चाह रखते हो।
अतृप्त इच्छा वह अग्नि है जो उसे ही खाती है जो उसे खिलाता है।
यदि चाहना कभी नहीं रुकता, देखो कि तुम वास्तव में क्या चाह रहे हो।
सौ छोटी इच्छाएँ एक बड़ी जंजीर से अधिक कसकर बाँध सकती हैं।
आनंद की इच्छा दूसरों को कुचलने वाली नहीं होनी चाहिए।
'और अधिक' ऐसा वाक्य है जो कभी पूरा नहीं होता।
और अधिक की योजनाएँ ठीक हैं; उन्हें पर्याप्त की जगह मत लेने दो।
लालसा, रोष और जकड़ के द्वार एक-एक करके बंद करो।
केवल आवेग पर कर्म करना शायद ही स्थायी सुख देता है।
लोभी मन फल बटोरता है; विवेकी मन प्रयास खुलकर लुटाता है।
पसंद और नापसंद वे दो डोरियाँ हैं जो कठपुतली को हिलाती हैं।
देखने और चाहने के बीच ठहरो; विवेक उसी अंतराल में रहता है।
कामना एक छोटी चिंगारी है; ध्यान वह हवा है जो उसे चाहिए।
आकर्षण या विकर्षण को अपने निर्णय मत लेने दीजिए।
फल के पीछे दौड़ते हुए पूछो कि तुम वास्तव में किसे पूज रहे हो।
योजनाएँ छोड़ दो, तब वस्तुओं और कार्यों का खिंचाव घट जाता है।
जब तुम और कहीं खोजना बंद करते हो, लालसा शांत हो जाती है।
जो उचित है उसे चाहना पाप नहीं।
सदा चढ़ते रहने की ज़रूरत छोड़ दो।
भटकी हुई महत्वाकांक्षा हानि का एक शांत रूप है।
अच्छे जीवन की अपनी इच्छा का सम्मान करो, फिर उसके पार देखो।
पाने और खर्च करने का चक्र थकाता है; विश्राम खोजो।
पतंगे और अग्नि याद दिलाते हैं कि हम कितनी आसानी से उसकी ओर भागते हैं जो हमें निगल जाता है।
आकर्षण एक जाल हो सकता है; उसे सावधानी से चुनो।
द्वेष उतनी ही क्षेत्र की गति है जितना आकर्षण।
जुनून अग्नि है: सँभाला जाए तो गर्म, अंतहीन खिलाया जाए तो हानिकर।
इच्छा वहीं उगती है जहाँ आप बार-बार लौटते हैं।
जो पाया उसे गिनना चुपचाप जो नहीं है उसे गिनना बन सकता है।
पूरी हुई इच्छा नई इच्छा को जगह देती है; चक्र से उतरो।
तीन आदतें अधिकांश हानि करती हैं: बहुत चाहना, बहुत जलना, बहुत जकड़ना।
अपनी पसंद से सीखो, उसके शासन में आए बिना।
कम चाहना स्वतंत्रता का एक रूप है।
लालसा से चलने वाला कर्म जल्दी बुझ जाता है।
फल के पीछे दौड़ते हुए हम बगीचा रौंद देते हैं।
लोभ हृदय को उसके ही विनाश के प्रति अंधा कर देता है।
भक्ति का वस्त्र पहनी इच्छा भी इच्छा ही है।
सुख और सत्ता के पीछे दौड़ता मन स्थिरता में नहीं ठहर सकता।
इच्छाएँ मन की अतिथि हैं; हर एक को भोजन कराना आवश्यक नहीं।
तुम्हारी कौन-सी चाह वास्तव में ‘पर्याप्त’ महसूस करने की इच्छा है?
जब कुछ श्रेष्ठ चखा जाता है, तब लालसा फीकी पड़ती है।
पसंद और नापसंद हर द्वार पर प्रतीक्षा करती हैं।
इच्छा वह अग्नि है जो कभी 'बस' नहीं कहती।
पसंद और नापसंद ही जंजीरें हैं; उन्हें ढीला करो।
पुरस्कार की लालसा हर काम को पिंजरा बना देती है।
स्वार्थी योजना छोड़ो, योग शुरू हो गया।
तुम तब पहुँचे हो जब महत्वाकांक्षा काम को चलाना बंद कर दे।
कम चाह एकांत को समृद्ध बनाती है।
सुख की कम योजनाएँ बनाने वाला मन अधिक शांति पाता है।
सभी इच्छाएँ जाल नहीं; जाल वह इच्छा है जो विवेक के विरुद्ध हो।
ज़रूरत भी सच्ची खोज की शुरुआत हो सकती है।
जब हम उसका पीछा करते हैं जिसे हमने परखा नहीं, स्पष्टता मिट जाती है।
इस जीवन या अगले में सुख खोजना मानवीय है।
पुरस्कार के लिए अनुष्ठान पुरस्कार देता है, उससे आगे कुछ नहीं।
तुम जो भी देखना चाहो, वह पहले से उस एक का हिस्सा है।
तमाशे की ओर दौड़ अक्सर हानि में समाप्त होती है।
जीवन का पूरा स्वाद लो; उसे तुम्हारा स्वाद मत लेने दो।
जब तुम लोभी और जल्दबाज़ी में हो, रजस ऊँचा है; धीमे हो जाओ।
इंद्रियाँ वे कोंपलें हैं जहाँ इच्छाएँ अंकुरित होती हैं।
गलत दृष्टिकोण और अधिक चाहने की मिट्टी में उगते हैं।
तीनों को नाम दो: चाह, क्रोध और और-अधिक की चाह।
तुम जो पसंद करते हो वह बताता है कि तुम कैसे जी रहे हो।
लालसा से प्रेरित कर्म छोड़िए; सेवा करने वाले कर्म रखिए।
लालसा से भरा कर्ता हर्ष और शोक के बीच झूलता रहता है।
जो सुख मीठा शुरू होकर खट्टा खत्म हो, उसे दूसरी नज़र से देखिए।
इच्छा से मुक्ति विश्राम का सर्वोच्च रूप है।
पसंद और नापसंद पट्टे हैं; उन्हें कोमलता से उतार दीजिए।
स्वाद तब तक बना रहता है जब तक हृदय को कोई ऊँची मिठास न मिल जाए।
कामनाएँ नदियों की तरह भीतर आती हैं; आंतरिक पूर्णता तट को बचाए रखती है।
कामनाओं को नदियों की तरह गुज़रने दो; अपना स्तर बनाए रखो।
अतृप्त चाह अच्छे विवेक को धुँधला करती है।
लालसाएँ बहुत वादा करती हैं और थोड़ा देती हैं।
परिणाम की इच्छा बेचैनी का इंजन है।
उन इच्छाओं को छोड़ो जिन्हें तुम्हारी अपनी योजनाएँ जन्म देती हैं।
लोभ परिश्रम को हानि में बदल देता है।
जब महत्वाकांक्षा मन को धुँधला करती है, तब उचित और अनुचित धुँधले हो जाते हैं।
इच्छा तेज़ हो, तो दोष अदृश्य लगता है।
केवल फल के लिए किया गया साधन तुम्हें दौड़ाता ही रहता है।
आध्यात्मिक जीवन भी आनंद की खोज का शिकार बन सकता है।
भोग में दोष नहीं; उसके स्वामित्व में आ जाना दोष है।
चाहना छोड़ो, और देखो तुम्हारे पास पहले से कितना है।
दुनिया से स्वयं को पूर्ण करने को कहना छोड़ो; यह कभी उसका काम नहीं था।
तुम वस्तु से उपवास कर सकते हो और फिर भी उसकी भूख रख सकते हो।
लालसा को ध्यान से भूखा रखो और वही ध्यान किसी श्रेष्ठ चीज़ को दो।
अपनी पसंद को पसंद ही रहने दो; उसे आदेश मत बनने दो।
और चाहना कम देखने का सबसे पक्का रास्ता है।
इच्छा इंद्रियों, मन और बुद्धि में अपना घर बनाती है।
लालसा को घृणा से नहीं, समझ से जीतिए।
संचय भरे घर को भी भूखा रखता है।
सुखों का पीछा करना खिसकते क्षितिज का पीछा करना है।
इच्छा तब मंद पड़ती है जब तुम उसे पोषण देना बंद करते हो।
शांत आवेग परम आनंद के लिए जगह छोड़ते हैं।
अनेक लोग शुभ कर्मों से अगले लोक में पुरस्कार खोजते हैं।
लोभ बेचैनी है जिसने खरीदारी का थैला पकड़ रखा है।
इच्छाएँ बलपूर्वक नहीं, भीतर की तृप्ति से शांत होती हैं।
तृष्णा से मुड़िए, और आप स्वयं की ओर मुड़ जाएँगे।
विवेकी इच्छाओं को छोड़ने और परिणामों को छोड़ने में भेद करते हैं।
परिणामों की उत्कट चाह कर्ता को बेचैन कर देती है।
इंद्रियाँ जितना वादा करती हैं, उतना देती नहीं।
‘कितना पर्याप्त है’ का प्रश्न आपको अंतहीन चाह से मुक्त कर सकता है।
भरोसा महत्वाकांक्षा की पहली हानि है।
देखिए कब छोटी इच्छाएँ बड़े निर्णयों को चला रही हैं।
पूछो कि तुम्हारी साधना वास्तव में क्या माँग रही है।
सत्ता और सुख की खोज हृदय को भूखा छोड़ देती है।
सत्ता शांति का वादा करती है और बेचैनी देती है।
अपनी चाहत को शांत करो, तो तुम्हारी बुद्धि को अपना आधार मिल सकता है।
पसंद-नापसंद के झूले से स्वयं को मुक्त करो।
स्वयं में विश्राम करो और पीछा करना चुपचाप थम जाता है।
सुख का इतना पीछा मत करो कि उसकी अनुपस्थिति हानि लगने लगे।
प्रलोभन से केवल बचो मत; उससे ऊपर उठो।
आज कौन-सा आवेग चुपचाप तुम्हारे जहाज़ की दिशा तय कर रहा है?
जो हृदय चाहने की चाह में डूबा रहता है, उसे कभी विश्राम नहीं मिलता।
बिना लालसा के चलो, तो मार्ग ही अपना पुरस्कार बन जाता है।
लालसा कभी पूरी तरह तृप्त नहीं होती।
इच्छा को देखिए; उसका आदेश मत मानिए।
चतुर सोच को भी इच्छा अपने पक्ष में भर्ती कर सकती है।
सुख और महत्वाकांक्षा एक ही वृक्ष की शाखाएँ हैं।
तर्क गढ़ना लालसा की सेवा में लगी बुद्धि है।
पहला स्वाद पूरा भोजन नहीं होता।
उस सुख से बचिए जो आपको सुलाए रखता है।
लोभ बहस नहीं करता; वह बस आपको देखने से रोक देता है।
चाह से दबा हृदय हानि का बोध खो देता है।
हम अक्सर आराम का पीछा ऐसी कीमत पर करते हैं जो हमने गिनी नहीं।
अनंत इच्छाएँ थकाती हैं; एक उद्देश्य टिकाए रखता है।
तुम अपने अनुशासन से क्या पाना चाहते हो, और क्या वह पर्याप्त है?
जो मन सदा और अधिक की भूख में है, उसमें स्थिरता नहीं उग सकती।
जो तुम्हें भड़काता है, उससे नज़र हटा लो, इससे पहले कि वह ऐसा बन जाए जिसे तुम मना न कर सको।
आकर्षण और विकर्षण अब भी तुम्हें कहाँ ले जाते हैं?
अकेले और लोभ में खाया भोजन भारी भोजन है।
केवल इंद्रियों के लिए जीना आधा-जागे जीना है।
उद्देश्यहीन भोग धीमा खालीपन है।
चाह की भूख सबसे पहले शांति को खाती है।
इच्छा आवश्यकता का वेश धर लेती है।
निरंतर लालसा निरंतर कोहरा है।
जानिए लालसा कहाँ रहती है, तब आप उससे निपट सकते हैं।
इच्छा एक चतुर किरायेदार है।
इच्छा फिसलने वाली है; स्थिरता उसे थामने का तरीका है।
लालसा को बल से नहीं, विश्राम की भूमि से जीतिए।
वह खोजो जिसकी ओर इंद्रियाँ संकेत करती हैं पर थाम नहीं पातीं।
जिन इच्छाओं को तुमने बोया नहीं, वे तुम्हें दबा नहीं सकतीं।
इच्छा को सेवक रहने दीजिए, चालक नहीं।
पसंद-नापसंद को सलाह देने दीजिए, आदेश नहीं।
लालसा के बिना किया कार्य कोई ख़ुमार नहीं छोड़ता।
इच्छा प्रयास को ईंधन देती है, पर उसे चिंता से भी भर देती है।
किसी चीज़ को बहुत चाहना आपके न्याय-बोध को मोड़ देता है।
पूछिए कि हर सुख अपने पीछे क्या छोड़ता है।
पूछिए कि कोई सुख कल आपको क्या कीमत चुकवाएगा।
आप जिसका पीछा करते हैं और जिसकी आपको आवश्यकता है, वे भिन्न हो सकते हैं।
जब चाह तीव्र हो जाए, तब मित्रों और परिवार के प्रति विशेष सावधान रहिए।
भावी जीवन में सुख खोजना हमें इस जीवन को जीने से भटका सकता है।
तुलना किसी और की भूमिका को वास्तविकता से अधिक सरल दिखाती है।
जिसकी आप लालसा करते हैं, वह आपको नियंत्रित करने लग सकता है।
स्पष्ट देखने के लिए लालसा-रहित एक क्षण चाहिए।
आज तुम अपने काम से चुपके से क्या पाना चाहते हो?
इच्छा और क्रोध ही असली बाधाएँ हैं; उन्हें पार करो, शांति निकट है।
इच्छा तेज़ हो तब अपना नैतिक दिशासूचक जाँचिए।
त्वरित आनंद अक्सर भविष्य की शांति से उधार लेता है।
आराम की चाह हमें अपने मूल्यों से बहुत दूर खींच सकती है।
लोभ और रोष एक ही ईंधन जलाते हैं।
भूखा मन भोजन-सूची गलत पढ़ता है।
तीन परतें एक लालसा को थामे रख सकती हैं।
तीव्र इच्छाओं को शीघ्र फल मिल जाते हैं।
तुम वास्तव में किस पुरस्कार के लिए काम कर रहे हो?
तुम क्या पीछा कर रहे हो जिसे रुककर देख सकते हो?
रस लेने से पहले देखिए कि भूखा कौन है।
तुम क्या पीछा कर रहे हो जो कभी संतुष्ट नहीं करता?
देखिए कब महत्वाकांक्षा ईर्ष्या पर पलने लगे।
संचय को अपने डटे रहने का कारण मत बनने दीजिए।
लालसा आपके हित की खराब मार्गदर्शक है।
मीठी शुरुआतें गारंटी नहीं होतीं।
परिणाम की कामना तेज़ राह है, पर क्षितिज छोटा।
लालसा के बिना तुम्हारी योजनाएँ कैसी दिखतीं?
आज तुम किसकी लालसा या किससे द्वेष कर रहे हो?
आज इच्छा, भय या क्रोध में से कौन तुम्हें सबसे अधिक पकड़े है?
तुम्हारी कौन-सी चाहतें तुम्हारे मूल्यों के अनुरूप हैं?
तुम्हारे जीवन का कितना भाग पाने और लौटने में बीतता है?
तुम किस लौ की ओर दौड़ते रहे हो?
तुम अपनी किन इच्छाओं को आज थोड़ा ढीला कर सकते हो?
जो संकल्प सुख के पीछे भागता है, वह जल्दी ऊब जाता है।
तुम्हारी कौन-सी इच्छा उस विचार से शुरू हुई जिसे तुम छोड़ सकते थे?
बेचैन फल का पीछा करते हैं; स्थिर बीज बोते हैं।
जो तुम बाहर ढूँढते रहते हो, उसे भीतर देखो।
इच्छा, भय और क्रोध से मुक्त हो, तो तुम पहले ही मुक्त हो।
तुम जो खोजते हो, वही तय करता है कि तुम कहाँ पहुँचते हो।
जिस पर तुम बार-बार सोचते हो, धीरे-धीरे वही तुम्हारी पकड़ बन जाता है।
बिना जकड़े आनंद लो; बिना घृणा के मना करो।
लालसा के बिना किया गया कर्म कोई अवशेष नहीं छोड़ता।
श्रद्धा से माँगो, प्रयास से काम करो, विनम्रता से पाओ।
स्वयं को जानने की चाह विवेक का आरंभ है।
इच्छा और कर्म के बीच रुको।
स्वतंत्रता जो चाहो वह करना नहीं; विवेक से चाहना है।
त्याग संसार का नहीं, चाह का होता है।
एक स्पष्ट उद्देश्य हज़ार बिखरी इच्छाओं से अधिक बलवान है।
जो केवल पुरस्कार के लिए काम करते हैं, जीतकर भी भीतर से निर्धन रहते हैं।
संतोष वहाँ शुरू होता है जहाँ चाह उससे मिलती है जो तुम पहले से हो।
इंद्रियाँ बलवान घोड़े हैं; लगाम अपने हाथ में रखो।
काम करो, चाह को जाने दो।
जिसमें न द्वेष है न लोभ, वह पहले से मुक्त है।
इच्छा और क्रोध की लहर को थामे रखो, वह गुज़र जाती है।
कृतज्ञता हर पूरी हुई इच्छा को आशीर्वाद बना देती है।
विवेक की भूख एक अच्छी भूख है।
सुखद से चिपकिए मत, अप्रिय से भागिए मत।
स्वतंत्रता है जो है, उससे न अधिक चाहना, न कम।
यदि तुम पीछा करो तो वह दूर है, और यदि विश्राम करो तो निकट।
जीवन का पूरा अनुभव लो; अपनी पसंद को ढीला थामो।
आत्म-ज्ञान विवशता का अंत है।
शांति भी एक संपत्ति बन सकती है यदि तुम उसे जकड़ो।
करने की आसक्ति पाने की आसक्ति जितनी ही बाँधने वाली हो सकती है।
अपने काम को परवाह से आने दो, लालसा से नहीं।
स्पष्टता से किया कर्म शांति लाता है; लालसा से किया कर्म तनाव।
अच्छे दिनों का पीछा मत करो; बुरे दिनों को मत कोसो।
जीवन में चाहने से अधिक है; देना भी है।
संतोष अतृप्त चाहत की औषधि है।
केवल सुख पूरे जीवन का भार नहीं सँभाल सकता।
जीवन में उससे अधिक है जो खरीदा या चखा जा सके।
लालसा, क्रोध और लोभ को छोड़ना स्वयं के प्रति दया है।
लालसा, रोष और लोभ से मुक्ति तुम्हें स्वयं के प्रति दयालु बनाती है।
तुलना शांति की चोर है।
इच्छा शांत हो तो कर्म निर्मल होता है।
विवेक वह कर्म है जिसमें से लालसा जल चुकी हो।
इंद्रियाँ अपने विषयों से मिलती हैं; तुम्हें घसीटे जाने की ज़रूरत नहीं।
जो लालसा और रोष से मुक्त है, शांति उसके निकट है।
स्वयं को जानो, चाहतें शांत करो, और तुम लगभग घर पहुँच गए।
स्थिर मन को बाहर से कम चाहिए।
अनुशासित मन आवश्यकता और लालसा का भेद जानता है।
पावन से कुछ माँगने से उसका होने की ओर बढ़ो।
पूछो कि तुम्हारी भक्ति को क्या चला रहा है: प्रेम, भय या लालसा?
जिसे तुम खज़ाने के रूप में खोजते हो, वह पहले से बीज के रूप में तुम्हारे भीतर है।
केवल पुरस्कारों पर बना जीवन उन्हें कमाता ही रहता है।
अंतर्दृष्टि का पीछा मत करो; जिसे प्रेम करते हो उसके निकट रहो।
अपने मूल्यों के अनुरूप प्रेम एक पावन शक्ति है।
शब्दों से अधिक की चाह रखने में संकोच मत करो।
उजाले में कूदने से पहले देखो।
किसी चीज़ की ओर दौड़ने से पहले पूछो कि उसकी कीमत क्या होगी।
कुछ झलकें दुर्लभ हैं, और विवेकी भी उनकी चाह रखते हैं।
संतोष है बिना मजबूरी के ‘बस, पर्याप्त’ कह पाना।
हर इंद्रिय एक खिड़की है; केवल खिड़की पर मत रहो।
जानो कि तुम किस तरह पकड़ने को प्रलोभित होते हो।
विवेक के बिना की प्रेरणा अक्सर पीड़ा में समाप्त होती है।
स्पष्टता ज्ञान लाती है, लालसा लोभ, कोहरा उलझन।
पसंद-नापसंद से मुक्ति एक शांत आनंद है।
सोने और कंकड़ को समान शांति से देखो।
जिसे आप सींचते हैं वही बढ़ता है; देखिए आप क्या पोषित कर रहे हैं।
अपने लक्ष्यों को चलाने वाले के बारे में ईमानदार रहो।
अनुचित ढंग से जोड़ा धन जोड़ने वाले पर बोझ बनता है।
क्रोध और लालसा रस्सियाँ हैं; देखो कि वे कहाँ खींचती हैं।
अगला 'मेरा' जोड़ने से पहले रुको।
आज की प्राप्ति के लिए कृतज्ञता तुम्हें कल की भूख से मुक्त करती है।
जब सुख ही सब कुछ बन जाए, जीवन सिकुड़ जाता है।
क्रोध, लालसा और लोभ सबसे पहले उसे हानि पहुँचाते हैं जो उन्हें ढोता है।
सनक पर बना सुख नाज़ुक है।
चाहत पर कर्म करने से पहले विवेकी की सुनो।
यदि तुम बदले की आशा से देते हो, तो उस आशा को पहचानो।
देखो कि क्या तुम्हारा देना वास्तव में व्यापार है।
भय, क्रोध और लालसा लहरों की तरह उठते हैं; स्थिर भूमि उनसे अधिक टिकती है।
संकल्प दरवाज़ा बंद कर सकता है, पर रुचि को केवल विवेक बदलता है।
तेज़ खिंचाव यह बताता है कि दुनिया शोर भरी है, यह नहीं कि तुम कमज़ोर हो।
क्रोध की जड़ लंबी होती है; वह इस बात से शुरू होता है कि तुम बार-बार कहाँ देखते हो।
स्वतंत्रता है बाज़ार से गुज़रना और केवल वही लेना जो चाहिए।
भीतर लालसा के साथ बाहरी अनुशासन केवल दिखावा है।
भीतर का संतोष बाहरी दौड़ को वैकल्पिक बना देता है।
क्रोध अक्सर वह इच्छा है जिसे रोका गया।
अधिकार-भाव सबसे भारी बोझ है जिसे हम ढोते हैं।
इंद्रियाँ सेवक हैं; उन्हें साधो, उनके आदेश मत मानो।
द्वेष और राग एक ही पकड़ के दो हाथ हैं।
चिंगारी को सूर्य मत समझो।
अपनी ही चालों में व्यस्त मन विश्राम नहीं पा सकता।
किसी भी चीज़ की अति, चाहे अच्छी हो, तुम्हें अस्थिर करती है।
वह जानना खोजो जिसके बाद पीछा करने को कुछ न बचे।
जो बल सेवा करता है, उसे लालसा और रोष की ज़रूरत नहीं।
जो चाहा वह मिले तो देने वाले को मत भूलो।
छोटे लक्ष्य छोटे और क्षणिक फल देते हैं।
बहुत सारी उलझन बस पकड़ने और धकेलने का छद्म रूप है।
हर उत्तेजना प्रवेश के योग्य नहीं।
हर आवेग तुम्हारा नहीं; कुछ केवल प्रकृति बोलती है।
कमाए हुए सुख समाप्त होने वाले सुख हैं।
और माँगो; सच्ची शिक्षा पोषित करती है, भरती नहीं।
सत्य के प्रति अपनी भूख को स्वस्थ रहने दो।
जो हृदय विश्वास करता है वह फिर भी देखने की लालसा रखता है।
शोक और लालसा एक ही पकड़ के दो चेहरे हैं।
इंद्रियों का उपयोग कीजिए; उनके उपयोग में मत आइए।
पावन से सौदेबाज़ी एक अकेला व्यापार है।
पुरस्कार की आशा से दिए उपहार ऋण हैं।
केवल लाभ के लिए किया गया कर्म छोटा ही रह जाता है।
हर लाभ का हिसाब रखते-रखते सामने का काम छूट जाता है।
छोटे खिंचावों को मना करो, तो बड़े खिंचाव कमज़ोर पड़ते हैं।
स्वतंत्रता है परिणाम से कुछ न चाहना।
ज्ञान तुम्हारी योजनाओं से इच्छा की गाँठें जला देता है।
संयम वह अग्नि है जो इंद्रियों को शुद्ध करती है।
भीतरी साधना के बिना छोड़ना बेचैनी को केवल दूसरी जगह ले जाता है।
हर आवेग आदेश नहीं होता।
तुम कौन हो, यह समझ लेने से जो तुम नहीं हो उसका पीछा करना बंद हो जाता है।
बिना समझ के निभाए नियम केवल वहीं पहुँचाते हैं जहाँ इच्छा इशारा करती है।
प्रार्थना छोटी चीज़ों की हो तब भी श्रद्धा हृदय को स्थिर कर सकती है।
श्रद्धा इच्छाओं को पलने की सुरक्षित जगह देती है।
अग्नि रूपांतरित करती है; सावधान रहो कि तुम उसे क्या खिलाते हो।
जब आपको कुछ नहीं चाहिए, तब आप सब कुछ प्रेम कर सकते हैं।
जब महत्वाकांक्षा और प्रेम अलग दिशाओं में इशारा करें, तब प्रेम की सुनिए।
द्वंद्वों के खिंचाव से ऊपर उठो; न लालसा करो, न ठुकराओ।
केवल तालियों के लिए किया गया काम तालियाँ थमते ही थम जाता है।
जहाँ अपेक्षा घटती है, वहाँ पीड़ा भी पतली पड़ती है।
बुरे से घृणा तुम्हें उतना ही कसकर बाँधती है जितना अच्छे की लालसा।
शांति उन्हें मिलती है जो हर पसंद-नापसंद से मोलभाव करना छोड़ देते हैं।
हर खिंचाव के पीछे चलोगे तो विवेक किनारे पर छूट जाएगा।
कर्म से बचना उसके खिंचाव को नहीं हटाता।
हाथों के संयम को हृदय का संयम मत समझिए।
आत्म-संतोष आलस्य नहीं; विवशता से मुक्ति है।
हम वह क्यों करते हैं जो हम करना नहीं चाहते?
घर में ही नहीं, हृदय में भी कम संग्रह करो।
लोभ के बिना कर्तव्य निभाने वाला साधु भी है और कर्मी भी।
कम रखो, तुम्हारे मन में अधिक जगह होगी।
पसंद-नापसंद से मुक्त होकर कर्म अपना सही रूप पाता है।
पूछिए कि राज्य किसलिए है।
जब आपके लक्ष्य आपके अपने न लगें, तब उन्हें फिर परखिए।
फल की लालसा से भी मुक्त रहो और निष्क्रियता के आराम से भी।
तुम वास्तव में किससे बच रहे हो: आदत से, या उसके नीचे की भूख से?
विचार से आसक्ति जन्मती है, आसक्ति से कामना, और रुकी हुई कामना से क्रोध।
जिसका संसार पीछा करता है, ज्ञानी उसे अनदेखा भी छोड़ सकता है।
गहरा मन कामनाओं को समा लेता है, उनसे डोलता नहीं।
एक चीज़ और पाए बिना भरा-पूरा महसूस करने के लिए तुम्हें क्या चाहिए?
अहंकार सबसे ऊँची लालसा है; उसे शांत करो, बाक़ी अपने-आप शांत हो जाती हैं।
खिंचाव को मानने से पहले उसे देखिए।
पूछिए कि जब आप चुन नहीं रहे होते, तब आपको कौन धकेलता है।
अग्नि अपने ही धुएँ से ढक जाती है।
‘बस’ कहना सीखिए और स्पष्टता को लौटते देखिए।
मन उसकी वकालत करेगा जो इंद्रियाँ चाहती हैं।
समझो कि तुम क्यों कर्म करते हो, और कर्म की पकड़ ढीली हो जाएगी।
स्वार्थ का संकल्प छोड़ना बोझ छोड़ना है।
खिलौनों और खेलों, दोनों से मुक्त रहो।
कुछ बातें गहराई से जानो, संसार की चमक फीकी पड़ जाती है।
‘पर्याप्त’ कह पाना ही संयम का आरंभ है।
शांति उसकी पहचान है जिस पर पसंद का शासन नहीं।
जो आपको कर्म की ओर प्रेरित करता है, वह परखने योग्य है।
सुख तीन प्रकार के होते हैं; जानिए आप किसका पीछा कर रहे हैं।
सर्वोत्तम सुख अगली सुबह भी टिके रहते हैं।
इंद्रियों के आकर्षण और विकर्षण, दोनों को छोड़िए।
आकर्षण और विकर्षण एक ही आसक्ति के दो पहलू हैं।
क्रोध और इच्छा ढोने में सबसे भारी दो चीज़ें हैं।
एक क्षण आता है जब महत्वाकांक्षा पूछती है: किसके लिए?
लोभी को मित्रों के साथ विश्वासघात छोटा लगता है।
भोग के प्रति आसक्ति वह एकाग्रता छीन लेती है जो विवेक को चाहिए।
संतोष गहरा सागर है; लालसा उथला ताल है जो बार-बार छलकता है।
संचय पूरे से की गई एक शांत चोरी है।
केवल सुख से जीवन नहीं भरता।
अपने खिंचाव को जानना उसे साधने का आधा भाग है।
स्वयं को दोष देने से पहले उस बल को समझिए।
विवेकी अपनी ही लालसाओं को सबसे अच्छी तरह जानते हैं।
विवेकी इच्छा-रहित नहीं होते; वे उससे धोखा नहीं खाते।
स्वतंत्र होने के लिए खोजिए कि चाह कहाँ छिपती है।
प्रयास के बदले पुरस्कार के सौदे से स्वयं को मुक्त करो।
सेवा की ओर लक्षित महत्वाकांक्षा, स्वयं की ओर लक्षित महत्वाकांक्षा से हल्की होती है।
इंद्रियों को जीत लो, संसार तुम्हें और नहीं भटका सकता।
इंद्रियों को अपनी वृद्धि की सेवा करने दो, लालसा की नहीं।
क्या चाहना है, यह तय करने से पहले याद कीजिए कि आप क्या हैं।
देखे जाने की चाह काम को प्रदर्शन बना देती है।
काम से अधिक पुरस्कार को चाहने पर काम को कष्ट होता है।
केवल पुरस्कार के लिए कर्तव्य थामना बेचैन ढंग से थामना है।
शोक और लालसा से मुक्त होकर आप दूसरों के लिए सचमुच उपस्थित हो सकते हैं।
हृदय व्यथित हो तो सुख अपना स्वाद खो देते हैं।
किसी पुरस्कार की चाह न रहना कभी-कभी विवेक की शुरुआत होती है।
हर संवेदना एक मुलाक़ात है जो समाप्त होती है।
संकल्प को ऐसा मन चाहिए जो भूख से बिखरा न हो।
स्थिर बुद्धि और बेचैन भूख एक ही घर में नहीं रह सकतीं।
पाने और बचाए रखने की चिंता सबसे थकाने वाला काम है।
भीतर की पूर्णता बेचैन होड़ का अंत है।
विकर्षण भी उतना ही कसकर बाँधता है जितना आकर्षण।
हम अक्सर अपने ही बेहतर विवेक के विरुद्ध कर्म करते हैं।
जड़ को समझिए तो शाखाएँ शक्ति खो देती हैं।
शांति भीतर की खींचतान का अभाव है।
जो सुन रहा है उसे जानिए, फिर सुनी हुई चीज़ का पीछा कीजिए।
जिस काम को तालियाँ चाहिए, वह आपको भूखा छोड़ता है।
जाँचिए कि आपकी महत्वाकांक्षा दूसरों को क्या कीमत चुकवाती है।
धन, सुख और कर्तव्य, तीनों कसकर थामने पर पिंजरे बन सकते हैं।
ध्वनि, दृश्य और स्वाद आपकी सेवा कर सकते हैं या आपको चला सकते हैं।
शांति तब आती है जब माँगों की सूची छोटी होती है।
शांत हृदय जीवन से भिन्न होने की माँग नहीं करता।
सच्चा दुःख मान लेता है कि महत्वाकांक्षा उसे सांत्वना नहीं दे सकती।
वादों में बह जाने पर मन उपस्थित रहना भूल जाता है।
तुम्हारे ध्यान को तुम्हारे अपने केंद्र से बार-बार कौन खींच ले जाता है?
योगदान उसे मुक्त करता है जिसे महत्वाकांक्षा बाँधती है।
स्वार्थी संचय हृदय पर बोझ बनता है।
इंद्रियों के अपने प्रिय होते हैं; आपके होना ज़रूरी नहीं।
अपने तर्क में छिपी इच्छाओं को जाँचिए।
ज्ञानी की योजनाएँ लोभ से स्वच्छ होती हैं।
तुम्हारा मन सबसे अधिक कहाँ भटकता है, और वह क्या खोज रहा है?
आज तुम्हारे लिए 'पर्याप्त' कैसा दिखेगा?
कर्म से पहले प्रेरणा आती है; जानिए वह कहाँ से आई।
यदि अच्छा लगने के लिए उसे बार-बार दोहराना पड़े, तो उस प्रतिरूप को पहचानिए।
मन की ‘पर्याप्त’ की बही शायद ही सटीक होती है।
जब संसार कोई पुरस्कार प्रस्तुत करे, तब पूछिए कि वह बदले में क्या माँगता है।
अपने दिवास्वप्न देखिए; वे आपकी वास्तविक आसक्तियाँ दिखाते हैं।
तुम क्या जकड़े बैठे हो जिसे बस थामा जा सकता है?
अभी तुम किस परिणाम को सबसे कसकर पकड़े हो?
आज तुम किस आवेग को माने बिना सह सकते हो?
तुम पावन से माँग रहे हो, या उसके हो रहे हो?
जिसका तुम पीछा कर रहे हो, क्या वह टिक सकता है?
आज तुम बिना गौर से देखे किसे पकड़ रहे हो या ठुकरा रहे हो?
तुम किस शिक्षा पर विश्वास करते हो पर उसे अनुभव करने की लालसा रखते हो?
तुम अपनी प्रकृति के बारे में सबसे अधिक क्या समझना चाहते हो?
अभी तुम किससे सबसे अधिक आसक्त हो?
तीनों द्वारों में से किसे बंद रखना तुम्हारे लिए सबसे कठिन है?
बेचैन होड़ शायद ही विश्राम तक पहुँचती है।
अपने सुखों को वर्गीकृत कीजिए और आपका जीवन स्पष्ट हो जाएगा।
आज तुम किस आवेग को बस देख सकते हो?
तुम्हारे आवेगों को सबसे अधिक क्या हिलाता है, और उन्हें क्या शांत करेगा?
जब तुम्हारी इच्छाएँ पूरी होती हैं तो तुम किसे धन्यवाद देते हो?
तुमने किस साधना को कुछ कमाने का तरीका बना लिया है?
थोड़ा मार्गदर्शन तुम्हारे आवेगों को कहाँ स्थिर कर सकता है?
तुम्हारा देना कहाँ अपेक्षा से मिला हुआ है?
आज बिना किसी नई चीज़ के तुम संतोष कहाँ पा सकते हो?
तुम किस सुख पर बहुत अधिक टेक लगाए हो?
तुम क्या अपनी योग्यता से अधिक कसकर पकड़े हो?
आज तुम कौन-सी स्वार्थी योजना छोड़ सकते हो?
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